कुछ क्षणिकाएँ

Thursday, January 24, 2019

आज कुछ समय के अन्तराल के बाद आपके सामने अपनी कुछ क्षणिकाओं को प्रस्तुत कर रही, जो बीते वर्ष अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका 'हिन्दी चेतना' के अक्टूबर अंक में प्रकाशित हुई हैं |



1-
कई बार जीना पड़ता है
बेमक़सद , बेवजह
बेमानी हो चुकी ज़िंदगी को भी-
जैसे हम अक्सर पढ़ते हैं कोई कविता
बस शाम गुज़ारने को...|

2-
कितना अच्छा होता
गर ज़िंदगी होती
कोई कविता
सुना लेते किसी को
या गुनगुनाते कभी किसी गीत सा;
पर ज़िंदगी तो
बस एक सूखी रोटी सी है
बेहद कड़क...बेस्वाद,
चबाओ तो कमज़ोर दांत टूट जाते हैं....|

3-
ख़्वाब तो होते हैं
बस किसी अंत-विहीन क़िताब से;
या फिर
कोई अनंत कहानी;
या अगर
ख़्वाबों की तुलना
क्षितिज से करूँ तो कैसा हो...?
बस देखो, और छू न पाओ...|

4-
फुदकती धूप
जाने कब
गोद में आ बैठी
दुलराया कित्ते प्यार से
ज़रा-सी आँख लगी
और ये जा, वो जा;

चंचल खरगोश कब एक जगह टिके हैं भला...?

5-
आँखें
अभ्यस्त हो गईं हैं
नमी और सीलन की
ताज़ा हवा से दम घुटता है
सोचती हूँ
इन्हें किसी बक्से में रख दूँ
बंद दरवाजों के पीछे से
किसको दिखती है दुनिया...?

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