बरनी में रखी कुछ यादें.

Wednesday, October 03, 2018


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नहीं जानती कि वर्षों पहले ३१ अक्टूबर की एक नर्म सर्द सुबह में जब मैने इस धरती पर पहली बार आँख खोली होगी, तो डॉक्टर-नर्सों की हथेलियों से निकल जब ममता भरी एक छाँव में मैने अपनी मिचमिची आँखों से जिसे देखा होगा, उस नानी को देख कर मुझे कैसा महसूस हुआ होगा...। मुझे चाहे जैसा लगा हो, इतना तो तय है कि अपनी प्रीमैच्योर-सतवासी दोहित्री को अपनी हथेलियों में समो मेरी नानी के चेहरे पर ज़रुर एक सद्य-स्मित खिला होगा...।

ज़िन्दगी-मौत के इतने लम्बे संघर्ष के बाद विजयी बन कर निकली अपनी सतवासी बेटी की पहली झलक बेहोश पड़ी मेरी माँ को काफ़ी देर बाद ही मिल सकी थी, पर ज़िन्दगी की विषमतम परिस्थितियों में भी सबको जूझने-लड़ने की हिम्मत देने वाली मेरी नानी ने ज़रूर मुझे देख कर कहा होगा-विजयी भव...।

जबसे होश सम्हाला, मैने नानी को हमेशा अपने आसपास ही पाया था। पाँच फीट से बस कुछ ज़रा-सी कम लम्बाई...भरा बदन...कमर के नीचे तक लहराते बेहद गझिन काले बाल, जिनका एक बड़ा सा जूड़ा बनाये रखना उन्हें बेहद पसन्द था...। थोड़ा लम्बापन लिए गोल चेहरा और उस पर निकली बीच की माँग में दिपदिपाता लाल सिन्दूर...गोराई की सीमा छूता ललछौंहा-सा गेहुँआ रंग...माथे पर दमकता गोल सिन्दूरी सूरज...खड़ी सुतवा नाक और उस नाक में बड़ी सी लौंग...। उस चेहरे की सबसे बड़ी सुन्दरता मेरी निगाह में थी उनके पतले होंठो पर हमेशा सजी मुस्कान और उस मुस्कान की रोशनी से जगमगाती उनकी आँखें...।

मेरी नानी दुनिया की सुन्दरतम औरत न सही, पर अगर मन की आँखों से किसी की सुन्दरता नापी जा सकती हो, तो वे दुनिया की सुन्दरतम महिलाओं में से एक थी। कानों में लटकते बड़े से झुमके, गले में मोटी सी चेन और हाथों में सोने के कड़े...ज़ेवरों में ये उनकी सबसे पसन्दीदा चीज़ें थी...। सिल्क की साड़ी उन्हें बेहद पसन्द थी। उनके हाथ पैर किसी मैनीक्योर-पैडीक्योर की देखभाल पाए बिना भी बहुत चमकते रहते थे...। गदबदे-छोटे-छोटॆ उनकी हथेलियों और तलुओं को देख कर अक्सर मुझे भगवान जी से शिकायत होती थी...मेरे हाथ-पैर इतने सुन्दर क्यों नहीं दिए...?

ननिहाल में कई सालों तक सबसे छोटी रहने के कारण मैं नानी-नाना की बहुत दुलारी भी रही। कच्ची उम्र में अधूरी पढ़ाई के साथ ही एक ज़मींदार खानदान में ब्याह दी गई मेरी माँ को ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ की तर्ज़ पर अन्ततोगत्वा पढ़ाई का महत्व समझ आ ही गया था और नानी के पास रोज़ सुबह मुझे भेज माँ घर-गृहस्थी के मकड़जाल को सुलझाती अपनी पढ़ाई भी पूरी करने में दिन भर जुटी रहती। ऐसे में नानी मेरी संरक्षक भी थी और सखी भी...। नानी के आगे-पीछे घूमती मैं जाने कितनी बतकहियाँ करती रहती, और नानी अपने घरेलू काम-काज निपटाती मेरी हर जिज्ञासा का समाधान भी करती चलती।

मेरी नानी को तरह-तरह के पकवान बनाने का बहुत शौक था। गर्मी के मौसम की आहट होते ही तरह-तरह के अचार डालने की शुरुआत हो जाती थी। पूरी रसोई की चारों तरफ़ की अलमारियाँ अचार की बरनियों और मर्तबानों से सज जाती थी। अब सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है, कभी थोड़ा सा अचार भी डालना पड़ता है तो कितना आलस आता है, और नानी आँगन में बैठ कर कितने मगन भाव से बड़े-बड़े टब भर के मिर्च, नींबू, आम, लसोड़े, कटहल, गाजर, अदरक और जाने किन किन चीज़ों के अचार डाला करती थी। अकेले आम के ही नाना प्रकार के स्वाद, रंग-रूप के अचार तो मानो अब भी मेरी ज़बान पर अपना ज़ायका छोड़ जाते हैं । नानी के चेहरे पर उस समय जिस परम संतुष्टि और मुग्धता का भाव रहता था, उनके जाने के इतने बरसों बाद भी वह ज्यों-का-त्यों मेरी नज़रों के सामने है...।

सिर्फ़ मेरे ननिहाल में ही सभी लोग नानी के अचार के फ़ैन नहीं थे, बल्कि कई सारे रिश्तेदार और जानने वाले भी मर्तबान भर-भर कर उनसे अचार ले जाया करते थे। नानी के रहते कभी माँ ने भी अचार-पापड़ जैसी चीजें नहीं बनाई...ज़रूरत ही नहीं थी न...। इस अचार से जुड़ी एक बहुत मज़ेदार घटना आज भी बरबस मेरे होंठो पर एक मुस्कान ले आती है...।

नानी की एक आदत थी। अक्सर कोई खास चीज़ बनाते समय वह उस चीज़ से जुड़ी किसी पुरानी याद की तरफ़ चली जाती थी। श्रोता होने के मामले में हम दोनो के बीच एक अनकहा समझौता था मानो...वो मेरी हर बचकानी बात बहुत गौर से सुनती थी, तो मैं उनकी हर ऐसी याद को अपने भीतर एक ‘पिन-ड्रॉप साइलेन्स’ के साथ घूँट-घूँट उतारा करती...। इसी साथ के चलते जब एक दिन उन्होंने यह बताया कि अपनी ज़िन्दगी का पहला अचार उन्होंने मात्र आठ साल की उम्र में एकल रूप से डाला था, तो मैं भी मानो बेहद जोश में आ गई। अगर नानी आठ साल की उम्र में अकेले ऐसे अचार डाल सकती थी, तो मैं भी तो सातेक साल की हो चुकी थी...। फिर मैं उनके साथ मिल कर क्यों नहीं ऐसा कोई यादगार करनामा कर सकती हूँ...?

यह ख़्याल आने भर की देर थी कि मैने बिना किसी रिक्त स्थान के ही अपना एप्लीकेशन उनके सामने प्रस्तुत कर दिया...फ़्री का असिस्टेन्ट...। मेरा ऐसा ज़ोरदार ऑफ़र सुन कर नानी का चेहरा दमक उठा। मेरी अर्ज़ी तुरन्त-फुरन्त मन्ज़ूर कर ली गई और अगले ही पल मैं पूरी मुस्तैदी से नानी के थोड़ा और पास सरक कर बैठ गई। नानी ने एक बड़ा सा लाल मिर्च उठाया, उसका पेट चीरा और उसमे अपने हाथों से तैयार किया हुआ मसाला भर कर उसे एक धागे से बाँध कर परात में रख दिया। मुझे यह सब दिखाते-सिखाते हुए नानी बेहद उत्साहित थी। बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई राजा अपने विरासत की बागडोर अपने वारिस को सौंप रहा हो, नानी ने बहुत एहतियाहत से अगला मिर्च भर कर उसे मेरे सामने की प्लेट पर सरका दिया...धागा बाँधने के लिए...।

उम्मीद तो यह थी कि नानी पूरी प्रक्रिया मुझे खुद करने देंगी, पर यह धागा बाँधना भी मुझे कम ज़िम्मेदारी से भरा काम न लगा...। सो इधर पूरे मगन भाव से नानी के हाथ अचार भर रहे थे, उधर मैं उतनी ही गम्भीरता से उन्हें बाँध रहे थे। काफ़ी वक़्त निकल गया इस सहयोगपूर्ण अचार-अभियान में...कि सहसा नानी का ध्यान सामने रखे अचार के परात की ओर गया और उनका चेहरा फ़क्क पड़ गया। इससे पहले कि उनके अवाक चेहरे को देख कर कॉक्रोच जैसे किसी अनवांछित मेहमान की आशंका से मैं वहाँ से कूदती-फाँदती भागती, नानी के चेहरे ने अपने सारे भाव ही बदल लिए थे। पहले तो उनकी उस खिलखिलाती, फिर आँसुओं के साथ बेआवाज़ निकलती हँसी के साथ हिलते उनके दोहरे बदन और उस हँसी को रोकने के असफ़ल प्रयास में उनका वो लाल होता चेहरा देख कर मेरी नन्हीं बुद्धि में कुछ घुसा ही नहीं कि आखिर माज़रा क्या है, पर जब उनकी उँगली के इशारे का पीछा करती मेरी निगाह भी सामने तैयार अचार के परात की ओर गई, तो भी काफ़ी प्रयत्न के बाद जाकर सब बात समझ आई...। 

सामने परात में हर तैयार अचार खुल कर बिखर-सा गया था। अपना काम ज़्यादा मुस्तैदी से करने के चक्कर में मैने यह देखा ही नहीं था कि धागे की रील लुढ़क कर परात के नीचे चली गई थी और मैं जाने कब से परात में बँधे पड़े अचार के धागे को ही खींच कर अगला अचार बाँधती जा रही थी। अब मेरे रोने की बारी थी।

मुझे रोता देख कर नानी की हँसी और भी बेकाबू हो चुकी थी। मेरी सातों सुरों वाली रुलाई और उनकी बेआवाज़ लोटती-पोटती हँसी ने वहाँ एक अजब ही समां बाँधा हुआ था। उस अनोखी जुगलबन्दी में आँसू हम दोनो की ही आँखों से बह रहे थे, पर उन आँसुओं की वजह और उनका स्वाद बिलकुल अलग ही थे...। बहुत मुश्किल से नानी ने सबसे पहले अपनी हँसी पर काबू पाते हुए मुझे चुप कराया, फिर अपनी गोद में बिठा हाथ पकड़ कर हर बिखरे अचार को ठीक करना सिखाया...।

थोड़ी देर बाद मेरी सफ़लता का जश्न मनाती हम दोनो की समवेत खिलखिलाती हँसी की महक से पूरा आँगन जो महका था...किन्हीं अनचाहे से बिखरे पलों को समेट उन्हें तारतम्य से बाँधते हुए आज भी वह महक मेरे आसपास रहती है ।

अपनी कच्ची सी उमर में नानी को देखते-जानते कभी यह समझ ही न पाई कि वो आखिर बनी किस मिट्टी की थी...? मेरे नाना ऐसी पोस्ट पर थे कि अगर चाहते तो जाने कितनी ऊपरी कमाई से अपना घर भर सकते थे, पर कुछ-कुछ अक्खड़ होने की हद तक उसूलों के पक्के होने के कारण सिर्फ़ उनकी तनख़्वाह में ही नानी किस तरह पूरे घर का मैनेजमेण्ट करती थी, यह शायद एक अध्ययन का विषय है। एक बड़े परिवार के साथ-साथ लगभग साल के तीन सौ साठ दिनों तक किसी न किसी रिश्तेदार की आमद को हँसते हुए सम्हालने वाली नानी मेरी बालसुलभ हरकतों और बचकाने सवालों का किस तरह भरपूर आनंद उठा लेती थी, समझदार हो जाने के बाद भी मुझे यह रहस्य कभी नहीं समझ आया...।

आम परिस्थितियों की बात तो तब भी उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, अपने पूरे जीवनकाल में मैने चिन्ता से उन्हें माथे पर हाथ रखे बैठे कभी नहीं देखा। तब भी नहीं, जब नाना को पहला दिल का दौरा पड़ा था, और पूरा घर किसी अनहोनी की आशंका से मुँह लटकाये बैठ गया था...।

मेरी पाँचवी का इम्तिहान ख़त्म होकर गर्मी की छुट्टियाँ शुरू ही हुई थी कि एक दिन कोर्ट में किसी केस पर बहस करते नाना गश खाकर गिर पड़े। मैं नानी के यहाँ ही थी, जब सूचना आई कि नाना को कार्डियोलॉज़ी ले जाया गया है। नानी की आँखों से उनके मन की उथल-पुथल का एक हल्का अन्दाज़ा भले मिला, पर ऊपर से वे बिल्कुल संयत थी। घर में सिर्फ़ मैं, माँ, छोटी मौसी और सबसे छोटे मामा ही जो थे...। बाकी सब ऑफ़िस और कॉलेज...ऐसे में अगर वे भी अपना संयम खो देती तो बाकियों को कौन सम्हालता...?

नाना को पेसमेकर लगाने की सलाह दे दी गई थी। बहुत सही से याद नहीं, पर उसकी कीमत इतनी थी कि शाम तक घर का हर सदस्य मुँह लटका कर, सिर-से-सिर जोड़ कर बैठ गया था...पैसे का इंतज़ाम कहाँ से हो...? अगर चेहरे पर शिकन किसी के नहीं था, तो वो थी नानी...। हॉल में बिछी अपनी पलंग पर एक पैर लटका के, दूसरा पैर मोड़े नानी पूरी मुस्तैदी से मुँहज़बानी सारे हिसाब-किताब में भाग ले रही थी। नाना की अनुपस्थिति में नानी ने हमेशा घर की मुखिया का रोल निभाया था, सो आज इतनी बड़ी मुसीबत की घड़ी में वे अपने फ़र्ज़ से मुँह कैसे मोड़ लेती...?

विस्तार में तो ख़ैर मैं नहीं जाऊँगी, पर नानी के धीरज का भरपूर इम्तिहान लेकर आखिरकार भगवान ने खुद ही हल निकाला...। डॉक्टर ने पेसमेकर की अनिवार्यता से इंकार करते हुए दो दिन में ही नाना को घर भेजने की शुभ सूचना दे दी थी...। कम पढ़ी-लिखी होने के बावजूद कब कौन सी दवा उन्हें देनी है, इसकी ज़िम्मेदारी भी नानी ने बड़ी कुशलतापूर्वक निभा डाली थी...।

जाने विधि का विधान था, या ईश्वर के पास नानी को बाँटी गई हँसी का ख़ज़ाना चुक गया था...इस विपत्ति के वर्षों बाद तक अनगिनत झटकों-मुश्किलों को पूरी निडरता से झेलने की परीक्षा में उन्हें खरा उतरते देख उसने नाना को बिना किसी सूचना के अपने पास कुछ इस तरह बुलाया, कि उनकी चेहरे की रोशनी भी ले गया...। नानी की खिलखिलाहट भले लुप्त सी हो चुकी थी, पर उनके स्वभावगत आत्मविश्वास...वह संबल सी देती उनकी आँखों की चमक उनको भी अचानक ले जाने वाला ईश्वर भी नहीं छीन पाया था...। तभी तो जाते-जाते अपनी आखिरी याद के रूप में वे किसी बात पर खुश हो अपनी उसी चमक से मुझे सराबोर कर गई...और अगले ही पल उन्हें अस्पताल ले जाती गाड़ी में विधि ने मुझे चढ़ने का मौका भी न दिया...।

मेरे मन की बरनी में रखे ऐसे अनगिनत खट्टे-मीठे यादों का स्वाद आज भी मेरी ज़बान पर कतरा-कतरा घुलता रहता है...। उन्हें संजोये रखने के लिए बस एक मुस्कान की धूप ही काफ़ी है...और यक़ीन मानिये, मेरी झोली में ऐसी धूप नानी बहुतायत में जमा कर गई हैं...।

   

                                     

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