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Sunday, August 20, 2017

नेकी कर दरिया में डाल...



बरसों क्या, शायद सदियों पुरानी कहावत है ये...नेकी कर, दरिया में डाल...| आज तक बाकी दुनिया की तरह मेरे लिए भी इसका बस एक ही मतलब था...किसी का भला करो और उसे हमेशा के लिए भूल जाओ...| भूल जाओ ताकि न तो तुमको अपने किए परोपकार पर कोई अहंकार हो, और न ही तुम्हारे दिल में सामने वाले से उस अहसान के बदले कुछ पाने की आकांक्षा हो...| अगर कुछ हो तो बस दिल में एक सकून...एक तसल्ली कि ये मानव जीवन किसी की भलाई करके कुछ तो सार्थक हुआ...|

पर जैसे समय के साथ बहुत कुछ बदलता है, वैसे ही आज के समय के हिसाब से शायद इस कहावत के अर्थ में भी थोड़ा हेर-फेर करने की ज़रुरत है...| अब तो शायद पूरा अर्थ समझने और समझाने के तरीके में बदलाव करना होगा | अब अगर आप भी परोपकारी हैं, तो आइन्दा जिसका भला कीजिए उससे साफ़ बोल दीजिए कि आपका किया-धरा आपके साथ-साथ वो भी दरिया में डाल आए...| अपनी बात स्पष्ट करने के लिए आपको एक सच्ची घटना प्रस्तुत कर रही हूँ...|

किसी शहर में एक लड़का रहता था...| ज्यादा उम्र नहीं है, यही कोई छब्बीस-सत्ताईस साल का...उम्र के हिसाब से ही हंसता-खेलता...थोड़ा मनमौजी सा लड़का...| एक बड़ी शादीशुदा बहन और माँ-बाप...| हर तरह से एक आम सुखी परिवार जैसा घर उसका भी था...| माँ-बाप, भाई-बहन में किसी तरह का कोई दुराव-छिपाव नहीं था कभी...| माता-पिता का अपने रिश्तेस्दारों और आसपास के लोगों से अच्छा व्यवहार चलता था...| लड़का भी रिश्तों को निभाना जानता था, अपने परिवार की तरह ही वो भी हर किसी के सुख-दुःख में शामिल रहता था...| खूब सारे दोस्त थे उसके...और जाहिर है उसके हंसमुख और मिलनसार स्वभाव के कारण बहुत सारे उसके करीबी दोस्त और रिश्ते भी बन गए थे...| उसके हर जान-पहचान और करीबी दोस्तों के बारे में उसके घर में भी सबको सब कुछ पता रहता था | वो कब-कहाँ और किसके साथ है, क्या कर रहा...ये सारी बातें वो खुल कर अपने घर में बता दिया करता था...| किसी की कही अच्छी बात भी...और किसी का किया बुरा भी...हरेक बात...| परिवार था भई, सब उसके अपने ही तो थे...और अपनों को हर बात बताना तो कितनी अच्छी बात है न...?

उसके हलके-फुल्के किस्सों से...साधारण से लगने वाले व्यवहारों तक तो तब भी सब सही चल रहा था...सिवाय माँ-बाप की कभी-कभी की नाराजगी से...पर असली मुसीबत तो तब शुरू हुई जब उसके हाथों जिनका भला हुआ था, उन्होंने बाकी दुनिया के सामने खुले दिल से उसके परोपकारी और मददगार स्वभाव की तारीफ़ करनी शुरू कर दी...| खुद को उसका अहसानमंद मानने वालों ने अपनी कृतज्ञता दिखाने के लिए जी खोल के उसके हर छोटे-बड़े कामों का बखान करना शुरू कर दिया...| लड़का भी अन्दर से थोड़ी खुशी महसूस करता हुआ विनम्रता से ये सब तारीफे कबूल कर लेता...| ख़ासतौर से अगर उसके रिश्तेदारों या परिवारवालों के सामने इस तरह की तारीफ़ आती तो उसको बेहद अच्छा लगता...| घर में छोटा और लाडला होने के कारण सब वैसे ही उसे ज्यादा सीरियसली नहीं लेते थे, ऐसे में उसे लगता, चलो...अब तो कम से कम सबको यकीन होगा कि मैं भी किसी के काम आने लायक हूँ...|

पर सारी मुसीबतें तो यहीं से शुरू हो गई...| जैसा कि हम सभी जानते हैं, हमारे आसपास हमेशा हमारी चिंता हमसे भी ज्यादा करने वाले अनेकों शुभचिंतक बसा ही करते हैं...| लड़के के आसपास भी थे | सो ऐसे जगत-चिंतकों ने बेहद चिंताग्रस्त होकर उसके ऐसे कारनामों की पूरी फेहरिस्त बनाई...फिर मुँह लटका कर अत्यंत  दुखी होकर उसके माँ-बाप को दुनिया के फरेबों से अवगत कराया...| फलस्वरूप जो बातें शायद उसके माँ-बाप के मन में सपने में भी न आती, अब वो ही सब बातें बेहद शिद्दत से उनके अन्दर जड़ जमा कर बैठ गई...|

परिवार की नज़र में लड़का एक तो पहले से ही मस्तमौला और गैर-ज़िम्मेदार हुआ करता था, अब उसके अवगुणों में `बेवकूफ़’ होना भी जुड़ चुका था...| माता-पिता और बहन, तीनों को पूरा विश्वास हो चुका था कि उसके अच्छे स्वभाव और निष्पाप-परोपकारी दिल का उसके हर जानने वाले ने न केवल फ़ायदा ही उठाया होगा, बल्कि ये भी संभव है कि उसे भड़काते हुए उसके परिवार से दूर भी करने की कोशिश की गई होगी...| पहले तो अप्रत्यक्ष रूप से उसकी दोस्ती-यारी के लिए कुर्बान रहने के लिए नाराजगी जताई गई, फिर उसके न समझने पर और अपनी तरह से ही सबके लिए हर समय उपलब्ध रहने के लिए खुलेआम उसको डांटा-फटकारा जाने लगा...| चुन-चुन के उसके दोस्तों और उनकी नीयत पर सवाल उठाया जाने लगा...|

इन सारी बातों से न केवल उसके हँसते-खिलखिलाते घर का माहौल खराब रहने लगा, बल्कि आपसी समझ और रिश्ते में भी एक अजीब सा खिंचाव आने लगा...| पर इसके लिए भी उसे ही ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा था | वह जितना इन सब बातों को सामान्य करने की कोशिश करता, अपने बाहरी रिश्तों को जितना डिफेंड करने की कोशिश करता, उतना ही ज्यादा उसे ही `मूर्ख’ और `घरवालों से दूर रहने वाला’ माना जाने लगा...| अब एक तरफ माता-पिता और बड़ी बहन उसके कार्य-कलापों पर नज़र रखने लगे कि वो कहाँ जा रहा, क्या कर रहा, किससे मिल रहा या बातें कर रहा...वहीं दूसरी ओर वह लड़का भी सोच-समझ कर अपनी बातें शेयर करता...| पहले बिंदास-बेलौस अंदाज़ में अपनी हर अच्छी-बुरी, छोटी-बड़ी बातें माँ-बाप और दीदी से बेझिझक कहने वाला लड़का अब अपने ही घर में बोलने से पहले, कुछ बताने से पहले उसके अच्छे-बुरे प्रभाव को तौलने लगा...| उसके इस दुराव-छिपाव ने घरवालों का शक़ और पुख्ता कर दिया...| वे डरने लगे कि उनका बेटा ज़रूर न केवल किसी ग़लत संगत में पड़  चुका है, बल्कि अब वो उन सबसे नफ़रत भी करने लगा है...| गाहे-बगाहे वे सब अपना ये शक़ उसके सामने भी साफ़ शब्दों में  ज़ाहिर करके उसे अपराधबोध से ग्रसित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे...| वो लाख सफाई देता, कितना भी अपना पक्ष रखने की कोशिश करता, उन सबको कितना भी यकीन दिलाने की कोशिश करता कि ऐसा कुछ भी नहीं है और उनका ऐसा शक़ बेबुनियाद है, पर उसे पूरी तौर से नाकारा और मूर्ख (यहाँ इमोशनल फूल कहना ज़्यादा सही होगा ) मान चुके घरवालों को उस पर राई-रत्ती भी यकीन नहीं हो रहा था |

 लड़का अपने परिवार से बेहद प्यार करता था | उनके बिना जीने की कल्पना मात्र से वो घबरा जाता था | लेकिन उसे अपने दोस्तों से भी बेहद लगाव था...| सब नहीं भी, पर कुछ गिने-चुने दोस्त उसके दिल के बेहद करीब थे...| उसने जितना उनके लिए किया था, एक-आध ने तो समय पड़ने पर उससे भी ज्यादा उसके लिए कर दिया था | पर ये बात भी सिर्फ़ वही समझ सकता था क्योंकि उसके घरवालों ने उसके उन दोस्तों के द्वारा की हुई भलाई में भी उन्हीं का कोई स्वार्थ होने की बात मान ली थी | हार कर उसने ये बात कहनी भी छोड़ दी थी...|

उसके अपने घर में रिश्ते इतने भारी होने लगे थे कि उसे ही कुछ करना था...| उसे अपने खून और मन के रिश्तों में से किसी एक को चुनना था | सो उसने अपने खून के रिश्तों को ही चुन लिया...| धीरे-धीरे उसने अपने मन के रिश्तों से दूरी बनानी शुरू कर दी...| कोई अपनी तकलीफ कहता, मदद की आशा में उसका मुँह ताकता तो वह नज़रें फेर कर वहाँ से चल देता...| दोस्तों के फोन उठाना, उनसे बातें करना, उनसे मिलना-जुलना...एक-एक करके उसने यह सब बंद कर दिया...| कोई घर आ जाता तो अक्सर उसे दरवाज़े से ही चलता कर देता...| उसके ख़ास दोस्तों को चिंता हुई पर वो खामोश रहा...सिर्फ़ `बिजी हूँ’ कह कर अपना मुँह सिल लेता |

सुबह समय से ऑफिस जाना और शाम को सीधे घर आ जाना ही अब उसकी दिनचर्या थी | माँ-बाप जो काम कहते, चुपचाप कर देता...| बहन की ज़रूरतों में उसका साथ दे देता | हमेशा हँसने-बोलने वाला लड़का अब चुप रहने लगा था | माँ-बाप का आदर्श बेटा बनने के चक्कर में उसने अपने-आप को ही एक खोल में बंद कर लिया...| पर घरवाले अब भी परेशान थे...| उनकी नज़र में उसका यह बदलाव भी उन्हीं के खिलाफ़ बग़ावत का ऐलान था | माँ-बाप और बहन के शक़ और अविश्वास से लड़का कितना आहत था, ये समझने की बजाय उसके इस व्यवहार ने उन्हें कितना मानसिक क्लेश दिया, वे सिर्फ़ इतनी ही बात समझ रहे थे |

ज़माने बाद उस लड़के की ख़बर मिली तो पता चला...इत्ती सी उम्र में हाई ब्लड-प्रेशर का शिकार हो चुके उस लड़के के एक्यूट डिप्रेशन का भी इलाज चल रहा...| माता-पिता डॉक्टर के अलावा मंदिरों के चक्कर भी लगा रहे ताकि एक बार आत्महत्या का प्रयास कर चुके उस लड़के पर जिस भी बदनीयत ने जादू-टोना करवाया हो, वो उतर सके...|

अगर गौर से देखें तो इस सारी कहानी के पीछे बस उस लड़के का नेकदिल होना ही सबसे बड़ी वजह बन गया...| कौन जाने, आज भी बिलकुल नहीं बदले ज़माने की तरह सदियों पहले भी यही होता आया हो और  ये तो हम ही नासमझ रहे हों जो आज तक नहीं समझ पाए कि नेकी की है तो उसे दरिया में डाला ही क्यों जाए...?   







18 comments:

  1. कल वाइरल हुए उस रोती हुई बच्ची के वीडियो पर सलिल वर्मा जी की बेबाक राय ... उन्हीं के अंदाज़ में ... आज की ब्लॉग बुलेटिन में |

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, गुरुदेव ऊप्स गुरुदानव - ब्लॉग बुलेटिन विशेष “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. सचमुच बहुत विषम स्थितियाँ हैं-तालमेल बैठाना मुश्किल हो जाता है.

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  3. आपकी लिखी रचना  "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 23 अगस्त 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!





    ......

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  4. नैसर्गिक स्वभाव पर बंदिशो ने लड़के को इस हालत में पहुँचा दिया ! सुंदर प्रस्तुति आदरणीया ।

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    1. हाँ, बहुत बार डिप्रेशन की वजह इस तरह की घुटन भी होती है, जो आमतौर पर लोग समझ नहीं पाते...|
      आभार !

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  5. सुन्दर प्रस्तुति। बधाई।

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  6. इसका उल्टा भी तो हो सकता है , कि ये लड़का जिनका भला करता आ रहा है , उनमे से हर कोई इस लडके को ही बर्बाद करता आ रहा हो और इस लडके को इस बात की कोई सुध भी न हो . और जब उसे इस बात का पता चले तो वो पछता-२ कर डिप्रेस हो जाए .....!!

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    1. हाँ, क्यों नहीं...| ये ज़िंदगी है जहाँ अच्छे-बुरे हर तरह के लोग मिलते हैं, और ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किस तरह के लोगों को अपनी ज़िंदगी में जगह देते हैं...| पर अगर-कोई बुरा तो नहीं मिल जाएगा- इस डर से हम अच्छे लोगों का साथ भी छोड़ दें तो ज़िंदगी फिर रह क्या जाएगी...?
      अगर कोई हमारी अच्छाई के बदले हमारे साथ बुरा करता है तो ये उसकी प्रॉब्लम है, उसकी नीयत है...भला करने वाले को तो ऐसे लोगों की वजह से कभी डिप्रेस होना ही नहीं चाहिए...|
      अपनी बात यहाँ कहने के लिए आपका शुक्रिया...|

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  7. वास्तव में परिवार और समाज में तालमेल बैठा पाना आज के समय में बहुत ही कठिन कार्य हो गया है जब अपने ही लोग तुम पर विश्वास न कर सकें.

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    1. सबसे ज़्यादा तकलीफदेह तो अपनों का अविश्वास ही होता है...|

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