ज़िन्दगी बाकी है

Tuesday, October 12, 2010

नमस्कार ,
आज मैं आपके सामने अपनी लिखी एक कहानी-ज़िन्दगी बाकी है- प्रस्तुत कर रही हूँ...। उम्मीद है आपको पसन्द आएगी और आप उस पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देंगे...।
वैसे तो मैने अपने जीवनकाल में न तो दो देशों के बीच होने वाले किसी युद्ध का अनुभव किया है और न ही करना चाहती हूँ...
( कारगिल युद्ध की बात नहीं कर रही...। ) , पर यह कहानी मैने युद्ध पर ही लिखी है...सो अगर इसमें किसी प्रकार की कोई वर्णनात्मक कमी अथवा गलती लगे तो अवश्य बताइएगा...।
शांति और अमन कायम रहे , ऐसी मेरी दुआ है...।
( चित्र गूगल के सौजन्य से हैं )



कहानी
                                                   ज़िन्दगी बाकी है
                                                                                                         प्रियंका गुप्ता

सायरन की आवाज़ से ख़त को लिफ़ाफ़े में रखते हुए डा. नोजिक के हाथ रुक गए ," उफ़ ! एक और हमला ।" डा. नोजिक लिफाफा अपने कोट की जेब में रखते हुए तेजी से उठ कर बाहर मैदान में बने बंकर की ओर लपके कि अचानक उन्हें कुछ याद आया और वे ठिठक गए ," नेविक , उसे तो मैं भूल ही गया ।" तेजी से वापस पलट कर लगभग दौड़ते हुए डा. नोजिक ने एक कोने में बेहोश पड़े नेविक को गोद में उठाया और वापस मैदान की ओर भाग पड़े । अभी बंकर में वह ठीक से घुस भी न पाए थे कि बम के एक जोरदार धमाके से उस अस्पताल की मानो सारी बिल्डिंग ही काँप उठी ।
" शायद फिर कोई हिस्सा उड़ा ," डा. नोजिक के बगल में घुटनों में अपना मुँह घुसाए , दोनो हाथों से कस कर अपना कान दबाए डा. विरोनिक बुदबुदाए ।
" हाँ , शायद ," प्रत्युत्तर में डा. नोजिक भी बुदबुदाए । अब तक उन्होंने भी डा. विरोनिक की तरह अपना मुँह घुटनों के बीच घुसा लिया था । एक बंदरिया की तरह उन्होंने नेविक को भी अपनी गोद में दबा रखा था । एक के बाद एक बमों के कुछ और धमाके भी उन्हें सुनाई पड़े । हर धमाके के साथ सबको लगता था कि उन धमाकों से डरती-काँपती धरती फट जाएगी और वे सब वहीं बैठे-बैठे अंदर समा जाएँगे ।
आज यह कोई नई बात नहीं हो रही थी । कौन सा ऐसा दिन गुज़रता था जब बोस्निया के उस युद्धग्रस्त क्षेत्र में कहीं न कहीं सर्बों का हमला न हुआ हो । कुल मिला कर करीब सवा सौ हमले तो उस एक अस्पताल पर हो चुके थे । आँख में पड़ी किरकिरी की तरह तकलीफ़देह था वह अस्पताल उन सर्बों के लिए । युद्ध और मौत के भय से जब मोहल्ले , कस्बे सब खाली हो रहे थे , लोग ज़िन्दगी की तलाश में मौत के पंजों से बच कर अपना घर-द्वार , साजो-सामान छोड़ कर भाग रहे थे , एक वही अस्पताल तो था जहाँ अभी भी कुछ डाक्टर , नर्सें और कर्मचारी " परमार्थ परमोधर्मः " की भावना चरितार्थ करने में लगे हुए थे ।
सब को अभी तक याद है वह शांति और खुशियों से भरे दिन , जब वह एक माना हुआ अस्पताल था । लोग दूर-दूर से आते थे यहाँ जीवन की आस लेकर । पूरा अस्पताल मरीजों , उनके तीमारदारों , डाक्टरों , नर्सों , कर्मचारियों की आवाजाही से कई मौतों के बीच भी ज़िन्दा रहता था । कितने दीपक इस अस्पताल में जले , कितने बुझे , किसकी ख़िज़ां में बहार आई और किसका जीवन वीरान खंडहर की मानिन्द हो गया , डा. नोजिक को अब कुछ याद नहीं । बस , कभी-कभी याद आता है तो मौत के हाथों जाती हुई ज़िन्दगी को वापस छीन कर पाने वालों की मुस्कान , आँखों में छलछलाते हुए आँसू , भावातिरेक से उनके हाथों को बार-बार चूमते चेहरे और अपने भीतर का सकून । लेकिन आज तो इस अस्पताल में कितने ऐसे लोगों की आमद है , जिनकी तीमारदारी के लिए उनके पास उनका अपना कहने को कोई नहीं बचा । क़ब्रों से बचे उन लोगों की आँखें मानो हर चेहरे में अपने अपनों का चेहरा पहचानने की कोशिश में लगी रहती हैं ।
शांति के सायरन की चिर-प्रतीक्षित आवाज़ को सुन कर सबके चेहरों पर एक अजीब भाव उग आया ," बच गए इस बार भी ।" कुछ पल पहले सब के चेहरों पर जो ख़ौफ़ की काली छाया था , उसकी जगह सकून की एक गुनगुनाती धूप-सी पसर गई जैसे । और इसके साथ ही जैसे पाले से सिकुड़ गई चौड़ी पत्तियाँ गुनगुनी धूप पाकर सीधी होने लगें , वैसे डा. नोजिक भी खड़े हो गए । पर तभी एक हल्का-सा झटका लगा । पीठ की कोई नस तड़क गई थी शायद । बेमकसद छोड़े गए तीर की तरह भटक गई दर्द की एक तीखी लहर रास्ता ढूंढती , उनकी समूची पीठ को चीरती निकल गई । उनके मुँह से एक धीमी " आह " निकल गई । उन्होंने पल भर आँख मूंद कर दर्द पर काबू पाने की कोशिश की । इससे उन्हें बहुत चैन मिला । उन्होंने आँखें खोल कर अपनी गोद में उठाए हुए नेविक की ओर देखा । वह अभी भी बेहोश था ।
" चलो , चल कर देखते हैं , फिर क्या ख़त्म हुआ , क्या बचा ," डा. विरोनिक ने बाहर निकल कर एक भरपूर अंगड़ाई लेते हुए कहा ।
" अरे नेविक , मैने तो इसकी ओर् ध्यान ही नहीं दिया ," अंगड़ाई से सीधे होकर थोड़ी मुश्किल से बाहर निकल पा रहे डा. नोजिक की ओर देख कर डा. विरोनिक बोले ," लाओ इसे मुझे दे दो ।" डा. विरोनिक ने झुक कर डा. नोजिक की गोद से नेविक को ले लिया । हथेलियों को सामने की ज़मीन पर टिका कर एक हल्की उछाल मार कर डा. नोजिक बाहर आ गए । अपने कपड़ों पर लगी मिट्टी , गर्द को झाड़ कर उन्होंने अपने दोनो हाथों को डा. विरोनिक के आगे फैला कर इशारे से नेविक को वापस माँगा ।
" आखिर इसे भी ले ही आए अपने साथ ," नेविक को वापस डा. नोजिक की गोद में देते हुए डा. विरोनिक बोले । प्रत्युत्तर में डा. नोजिक सिर्फ़ मुस्करा भर दिए और नेविक को कुछ और सावधानी से अपनी बाँहों में जकड़ लिया ।
नेविक के प्रति डा. नोजिक का मोह इस अस्पताल में बचे सभी लोगों को पता था । यूँ तो कोई खून का रिश्ता नहीं था दोनो का । दोनो तो एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे । दस वर्षीय नेविक तो उन दुर्भाग्यशाली घायलों में से एक था , जो सर्बों के हमलों में घायल होकर हफ़्ता भर पहले ही अस्पताल लाया गया था । अपने घर में अकेला वही बचा था , सबकी मौत से बेख़बर , अपनी मौत से जूझता हुआ । पहली बार आपरेशन टेबिल पर ही उसे देख कर पता नहीं उसके चेहरे से डा. नोजिक को क्यों अपने बेटे पुश्किन की याद हो आई , जिसे उन्होंने सुरक्षा की दृष्टि से अपनी पत्नी के साथ उसके भाई के घर भेज दिया था । नेविक का चेहरा , उसकी कद-काठी कितनी तो मिलती थी पुश्किन से । शायद यही कारण है कि वर्षों से एक कुशल दर्जी की तरह् मानव अंगों को चीरते-काटते , सिलते उनके हाथ पहली बार काँपे थे , जब उन्हें नेविक का पैर काटना पड़ा था । शरीर में पल-पल फैलते जा रहे ज़हर से इन परिस्थितियों में उसकी रक्षा के लिए यही एक विकल्प था उनके पास ।
पर नेविक की जान बचा कर भी उसे ज़िन्दगी नहीं दे पाए थे डा. नोजिक । होश में आने पर अपनी टाँगें कटी पाकर नेविक ने उनकी ओर देख कर बस इतना ही कहा था " मैने अपने डैडी को वायदा किया था कि मैं एक अच्छा खिलाड़ी बनूँगा , एक अच्छा फुटबाल प्लेयर । पर मैं अब कभी अपना वायदा नहीं निभा पाऊँगा । उन्हें कुछ मत बताना डाक्टर , कभी मत बताना , चुप रहना बिल्कुल...ओ.के...।" अपने होंठो पर उंगली रख कर इशारे से उन्हें चुप रहने को कहता नेविक अचानक चीखने लगा था । उसे काबू करने के लिए नींद का इंजेक्शन देना पड़ा था और तब से नेविक या तो जबर्दस्ती सुलाने के लिए लगाए गए इंजेक्शन के प्रभाव से बेहोश-सा पड़ा रहता है या फिर होश में आने पर अपनी आसमानी नीली आँखों में आकाश की सारी शून्यता समेटे चुपचाप बैठा रहता है । डा. नोजिक को मालूम है , नेविक ज्यादा दिन नहीं जी पाएगा । लेकिन फिर भी , वो चाहें तो भी , वे नेविक को छोड़ नहीं सकते । कम-से-कम जब तक नेविक की साँसें बाकी हैं , तब तक तो बिल्कुल नहीं ।
" इसे लिटा दो नोजिक , कब तक यूँ ही लिए रहोगे । अब सब कुछ ठीक है ।" डा. विरोनिक की आवाज़ से चौंक कर डा. नोजिक जैसे वापस् वर्तमान में आ गए । अपनी यादों के समन्दर में तैरते-तैरते डा. नोजिक कब नेविक के बिस्तर तक पहुँच भी गए , उन्हें पता ही नहीं चला । उन्होंने बड़ी आहिस्तगी से नेविक को लिटा दिया । बेहोशी में खामोश पड़ा नेविक कितना मासूम और प्यारा दिख रहा था ।
" चलो देखें , उन सर्बों ने हम पर कहाँ फूल बरसाए हैं ," डा. विरोनिक ने हँसते हुए डा. नोजिक की पीठ ठोंकी तो जल्दी से डा. नोजिक ने अपनी आँखों में छलक पड़ने को आतुर आँसुओं को पोंछ लिया । डा. विरोनिक की यह हँसी ही तो तमाम आँसुओं के बीच उन सब को ज़िन्दा रखे हुए है । लम्बोतरे चेहरे , जिस पर आगे की ओर कुछ मुड़ी-मुड़ी सी नाक कुछ-कुछ तोते की नाक की याद दिलाती है , गहरी हरी आँखें , जिन पर वह् हमेशा पतला , सुनहरी फ़्रेम वाला चश्मा चढ़ाए रहते हैं । बिखरे-बिखरे सुनहरे बाल और लंबे कद वाले डा. विरोनिक इस अस्पताल की शान थे । हमेशा से इस अस्पताल में गूंजने वाली उनकी हँसी आज भी नहीं बदली । खुशी हो या ग़म , सबको डा.विरोनिक हँसी की ढाल पर ही झेलते हैं ।
" क्यों रोऊँ मैं ?" वो अक्सर कहते हैं ," ये स्टुपिड सर्बियन यही तो चाहते हैं कि हम बोस्नियाई कुछ तो इनके बमों से , और बाकी बचे रो-रो कर मरें । पर मैं इनकी यह चाल कामयाब नहीं होने दूँगा ।"
" देखो ! इडियट्स ने यहीं पानी के ड्रम्स पर ही बम बरसाए हैं । स्टुपिड , इडियट्स..." खुद से बतियाते डा. विरोनिक अचानक डा. नोजिक की ओर पलटे ," एक तो रोज बमुश्किल इतना कम पानी मिलता है , उस पर भी आज कितना पानी खराब कर दिया । ये तो कहो , आज मेरे मन में पता नहीं क्या आया कि मैंने सारा पानी अलग-अलग रखवाया । इसी से काफ़ी पानी बच गया , वरना आज तो नर्सों ने जो पानी शीशियों में भर रखा है , उन्हीं से काम चलाना पड़ता । " डा. विरोनिक बड़बड़ाते-बड़बड़ाते अचानक फिर हँस पड़े ," पर एक बात है नोजिक , हमें बूँद-बूँद पानी को तरसाने की उनकी चाल तो कामयाब नहीं हो पाई , डैमफ़ूल्स...।"
डा. नोजिक डा. विरोनिक की तरह न तो बड़बड़ा सके और न ही हँस सके । उन्हें बड़ा अजीब-सा अहसास हो रहा था । विरक्ति और अनुरक्ति का अहसास एक साथ ।
पता नहीं क्यों हर हमले के बाद उन्हें यह अजीब-सा अहसास होता है , यह वो खुद भी नहीं समझ पाते । इससे बचने के लिए वह किसी से भी बातों में लग जाते हैं ," एक बात बहुत दिनों से पूछना चाहता हूँ आपसे । बुरा तो नहीं मानेंगे ?" डा. नोजिक की बात सुनकर डा. विरोनिक ने अपनी पुरानी अदा से आँखें मूंद कर " न" में सिर हिला दिया ।
" आपको ऐसा नहीं लगता डा. विरोनिक कि जब से यह लड़ाई-झगड़े शुरू हुए हैं , तब से आपकी बातों में अचानक ये गालियाँ भी शामिल हो गई हैं । खास तौर से सर्बियन्स के लिए ?"
डा. नोजिक की बात सुन कर डा. विरोनिक के चेहरे से हँसी मुठ्ठी भर रेत पर पड़े एक बूंद पानी की तरह सूख गई ," हाँ , ये सच है नोजिक । मैं जानता हूँ , तुम सब मेरे मुँह से गालियाँ निकलने की न तो अपेक्षा करते हो और न ही इसे पसन्द करते हो । पर नोजिक , जिस इंसान के सामने उसका पूरा परिवार इन्हीं सर्बियन्स की बरसाई आग में खत्म हो जाए और वह इंसान डाक्टर होने के बावजूद कुछ न कर सके , वह इन सर्बों को गालियाँ न दे तो और क्या दे ?"
इस अप्रत्याशित रहस्योघाटन से हतप्रभ खड़े डा. नोजिक के सामने हाथों पर थोड़ी पट्टियाँ बाँध कर मरीजों की सेवा करते डा. विरोनिक की तस्वीर कौंध उठी ," तो क्या जब आपको चोट लगी थी तब...?"
" हाँ नोजिक ! तभी खत्म हुआ था मेरा सब कुछ । मेरे मकान ने मलबे ने सिर्फ़ मुझे ही छोड़ा था , और किसी को नहीं ।"
जिस व्यक्ति ने ऐसे हालात में भी अपने आँसू हँसी के पर्दे में छुपा कर रखे , अपने सामने खड़े ऐसे व्यक्ति के प्रति डा. नोजिक का मन असीम श्रद्धा और आदर से भर उठा ," यू आर ग्रेट डा. ।"
डा. नोजिक के उदगार सुन कर डा. विरोनिक हँस पड़े ," डोंट ट्रीट मी सो ग्रेटली , नोजिक । भूल जाओ सब , सिर्फ़ अपना फ़र्ज़ याद रखो ।"
अब तक डा. नोजिक भी अपने आप को संयत कर चुके थे । बात बदलने की गर्ज से उन्होंने डा. विरोनिक से दूसरा प्रश्न पूछ लिया ," ये डा. बेजिक और डा. आशेन कहाँ हैं ?"
" उन्हें यहाँ आते वक़्त तुम्हारे सामने ही तो मरीजों का हाल देखने भेजा है । तुम भी बड़े अजीब हो , पता नहीं हर वक्त कहाँ खोए रहते हो ," डा. विरोनिक कर्मचारियों को मलबे के बीच बचे सामानों को रखने -हटाने का निर्देश देने लगे । डा. नोजिक को शर्मिन्दगी सी महसूस हुई । सच ही तो कहा डा.विरोनिक ने । जब से पत्नी तान्या और बेटा पुश्किन नज़रों से दूर हुए , मौत और ज़िन्दगी के बीच हमेशा से जीने वाले डा. नोजिक इस भीषण विभीषिका में शायद दो पल का सकून ढूंढने अपनी यादों की गुफा में वापस चल देते हैं ।
तान्या तो उन्हें भी अपने साथ ले जाना चाहती थी । इन सबसे दूर , पर वह ही नहीं गए ," नहीं तान्या , ," उन्होंने विदा लेते वक्त रोती हुई पत्नी को समझाया था ," अभी बहुतों को मेरी जरूरत है । मैं इन सबको छोड़ कर सिर्फ़ अपने को बचाने की खातिर कहीं नहीं जा सकता और तुम्हारा यहाँ से जाना बहुत जरूरी है । अपने लिए न सही , मेरे लिए ही , हमारे इस बेटे के लिए और उसके लिए भी जो मुझे पापा कहने के लिए आने वाला है । अगर मैं बच सका तो फिर से हम सब मिल कर रह सकेंगे वरना...।" आगे उनसे भी कुछ नहीं बोला गया था । कुछ ही देर में वे दोनो उनसे दूर हो गए थे और वह वापस आ गए थे इसी अस्पताल में । जीना यहाँ , मरना यहाँ...।
अपने ही ख्यालों में खोए आगे बढ़ते जा रहे डा. नोजिक पता नहीं कैसे दीवार से टकरा कर चौंक पड़े । अब यहाँ रहते-रहते यादों में कहीं और खो जाना उनकी आदत में शुमार-सा हो गया है ।
" क्या करूँ मैं ? आई कान्ट हैल्प इट ," डा. नोजिक खुद से बुदबुदाए और अस्पताल के दवाई वाले हिस्से की ओर चल पड़े । रास्ते के गलियारे में एक-दो हिस्से की टूटी , चटकी दीवारें , काफ़ी कुछ उखड़ गया पलस्तर उन्हें उस हिस्से पर हुए दो हमलों की याद दिला गया । पर इस बार प्रभु की दया से वहाँ सब कुछ बच गया था । यहाँ तक कि वह जैनेरेटर भी सुरक्षित था , जिन्हें आजकल उन्हीं आपरेशनों के लिए इस्तेमाल किया जाता था , जिनमें मशीनों की जरूरत हो वरना आजकल तो सारे आपरेशन प्राकृतिक रौशनी में ही हो रहे थे ।
" इंसानी अविष्कारों का कितना गुलाम हो जाता है इंसान ही ," डा. नोजिक को लगा । वरना क्या उन्होंने कभी सोचा था कि सूरज जैसे बल्ब की रौशनी में आपरेशन करने वाले उनके हाथ कभी वास्तविक सूरज की रौशनी में आपरेशन करेंगे और आपरेशन भी कैसा ? क्षतिग्रस्त अंग को सीधे-सीधे काट देना , बस्स ! कितनी नफ़रत थी डा.नोजिक को किसी मरीज के अंगों को काटने से ।
" अंग-भंग करना मेरी पराजय है और पराजय स्वीकारना मेरी आदत नहीं ।" यही तो कहते और करते थे डा. नोजिक हमेशा । यही कारण था कि क्षतिग्रस्त अंगों के मुश्किल केस हमेशा उन्हीं के सुपुर्द किए जाते थे और वे हर प्रयत्न करके मरीज को उसी के अंगों के साथ विदा करते थे । बहुत ख्याति थी उनकी एक कुशल सर्जन के रूप में और आज वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते । न तो वे साधन रहे , न दवाइयाँ और न ही डाक्टर...। कुल पन्द्रह लोग ही तो रुके हैं अभी तक इस अस्पताल में , अपनी जान हथेली पर लेकर...।
डा. नोजिक ने बहुत थकान महसूस की । शरीर से ज्यादा थकान तो उनका दिमाग महसूस कर रहा था । सर्ब शायद कहीं और हमला नहीं कर सके थे , वरना अब तक कुछ घायल और आ जाते । डा. नोजिक के सिर की नसें तड़कने-सी लगी थी । पिछले दो दिनो से ठीक से बैठ भी नहीं पाए थे , शायद इसी लिए । डा. नोजिक ढीली चाल से आकर नेविक के पैताने बैठ गए और दीवार से टेक लगा कर अपनी आँखें मूंद ली ।
अर्द्धनिद्रावस्था में जाते डा.नोजिक ने तान्या को देखा , पुश्किन को देखा और देखा अपने उस अनदेखे शिशु को , जिसका नाम - वे जानते हैं - तान्या ने उनके कहे अनुसार मिखाईल ही रखा होगा । अभी डा. नोजिक ने अपना हाथ आगे बढ़ाया ही था , ताकि एक बार तो मिखाईल को अपनी गोद में लेकर उसका मुँह चूम सकें और स्पष्ट देख सकें कि कैसा है वो , कि तभी कंधे पर एक स्पर्श ने उन्हें वापस जागृत अवस्था में ला दिया । कहाँ थे तान्या , पुश्किन और मिखाईल...। उन्हें तान्या को वो संक्षिप्त ख़त याद आया । उनका मिखाईल तो कहीं था ही नहीं । इस नफ़रत और दहशत के माहौल में जन्म लेने की बजाय उसने अपने सुरक्षित घर में दम तोड़ना ही बेहतर समझा । बहुत डर गया था शायद वह इन बमों के धमाकों से...।
सामने डा. विरोनिक एक नवजात शिशु को गोद में लिए मुस्करा रहे थे ," मुबारक़ हो नोजिक , आज मैने एक नए बोस्नियाई को इस दुनिया में प्रवेश कराया है । बहुत दिनो बाद , एक बार फिर...। देखो इसे , कितना प्यारा है...।"
डा. नोजिक धीरे से उठ खड़े हुए । बड़ी ही आहिस्तगी से उन्होंने शिशु को गोद में लेकर उसका मुँह चूमा और महीनों बाद एक बार फिर खिलखिला कर हँस पड़े । उनकी जेब में उनका अपने अनदेखे , अजन्मे शिशु को मोहब्बत और अमन-चैन की उम्मीदों , आश्व्वासनों से भरा खत भी मानो खुशी से फड़फड़ा उठा...।

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16 comments

  1. छुपी रुस्तम निकली प्रियंका । बहुत अच्छी कहानी है ।पूरी तरह कसी हुई -आद्यन्त निमग्न कर देने वाली। बहुत बधाई ! अपनी कलम को सर्जनपथ पर चलाती रहना;

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  2. Your writing really intruiges me... it really touches the simple human soul and makes it cruise on a huamn gloary and suffers...it just trancends all boundaries of human feelings and its so devine.. Thank you so much for all this...

    You know.. some times you keep me grounded..

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  3. कहानी बहुत अच्छी लगी !
    दिल को छू गई!

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  4. प्रियंका जी,
    आपकी कहानी दिल को छू गयी !
    इतनी सुन्दर और सशक्त अभिव्यक्ति के लिए मेरी बधाई स्वीकार कीजिये!
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ
    www.marmagya.blogspot.com

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  5. प्रियंका जी,
    आपकी कहानी दिल को छू गयी !
    इतनी सुन्दर और सशक्त अभिव्यक्ति के लिए मेरी बधाई स्वीकार कीजिये!
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ
    www.marmagya.blogspot.com

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  6. कहानी में भाषा-प्रवाह को भी बख़ूबी निभाया है आपने! बधाई...!

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  7. bahut hee khoobsurat kahanee...badhayi

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  8. उतम कोटि का सन्देश देते हुई एक सार्थक कहानी ,

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  9. आपके ब्लॉग पे युहीं आ गया, पता नहीं कैसे, लेकिन आना अच्छा रहा...कहानी बहुत अच्छी लगी..बेहद..

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  10. बस एक बात पूछना चाहूँगा, की आपने कहा ये कहानी आपसे जुड़ी हुई नहीं है,
    तो क्या ये सिर्फ एक कहानी है या हकीकत...
    क्यूंकि एक मेरे दोस्त के बड़े चाचा हैं.., उनकी भी एक कहानी ऐसे ही युद्ध के ऊपर थी...

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    1. तारीफ़ का शुक्रिया...वैसे ये काल्पनिक कहानी ही है...|

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  11. आप सभी की इतनी अच्छी प्रतिक्रियाओं के लिए बहुत आभारी हूँ...।

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  12. वैसे तो मैने अपने जीवनकाल में न तो दो देशों के बीच होने वाले किसी युद्ध का अनुभव किया है और न ही करना चाहती हूँ...

    मार्मिक कथा , उससे मार्मिक यह कथन कि मैं युद्ध नहीं देखना चाहती...आपकी शांतिप्रियता को नमन

    शांति और अमन कायम रहे , ऐसी मेरी दुआ है...

    मेरी भी

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  13. Posts are heart touching and mind blowing . It shows present day conditions. Deepak Tripathi

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  14. बहुत अच्छी कहानी...!
    हृदयस्पर्शी है, ह्रदय से ही लिखी हुई जो है!!!
    अनंत शुभकामनाएं आपको!

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