जैसे उनके दिन बहुरे...

Wednesday, November 01, 2017

अभी हाल में ही दैनिक जागरण में प्रकाशित कहानी 'बस ऐसे ही...' पर ढेरों उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रियाओं से दिल खुश हो ही रहा था कि तभी  प्रतिष्ठित पत्रिका 'कथाक्रम' के ताज़ा अंक (जुलाई-सितंबर2017) में मेरी कहानी 'जैसे उनके दिन बहुरे...' छपने की सूचना मिली...| इस पर भी कई सारे लोगों ने बेहतरीन प्रतिक्रियाएँ देकर मेरा उत्साह बढ़ाया...|

तो लीजिए, प्रस्तुत है, मेरी नई कहानी- जैसे उनके दिन बहुरे...', आपकी टिप्पणियों का भी इंतज़ार रहेगा |





अक्सर मुझसे जब कोई नया इन्सान मिलता है, तो कुछ देर इधर-उधर की बात करने...थोड़ा बहुत परिचय होने के बाद उसका अगला सवाल, जो कि अब तक इतनी बार मुझसे पूछा जा चुका है कि मैं अब जैसे हर नए परिचय में इसी सवाल का इन्तज़ार-सा करती हूँ, मेरे सामने बड़ी सहजता से दाग दिया जाता है...तो आप सिर्फ़ हाउसवाइफ़ हैं या कहीं कुछ काम भी करती हैं...। जितनी लापरवाही और सहजता से यह सवाल मेरे सामने आता है, उतनी ही लापरवाही से मैं अपनी ज़ुबान अपने तालू पर टिका कर उसे बाहर फेंकते हुए ‘टक्क’ सी एक ध्वनि के सहारे उसकी बात बिल्कुल नकार देती हूँ...नऽऽऽ, कोई काम नहीं करती, सिवा घर-गृहस्थी के...। सुनकर अक्सर सामने वाले का मुँह कुछ मातमी अन्दाज़ में इस तरह लटक जाता है मानो उसे मेरी इस दयनीय स्थिति पर बेहद अफ़सोस है...। अगर सवाल दागने वाला आमने-सामने न होकर फोन पर मुझसे पहली बार मुख़ातिब हो रहा हो तो उसके एक छोटे से ‘ओह!’ में उसका पूरा दर्द मुझे दिखाई दे जाता है...। ऐसे में मुझे भी उसे उत्तर देने के लिए पूरे वाक्य का प्रयोग करना पड़ता है, बजाये सिर्फ़ ‘टक्क’ भर कर देने के...।

लोगों के ऐसे अफ़सोसनाक प्रतिक्रिया देख-सुन कर इधर मैं कुछ ज़्यादा ही बेचैन होने लगी हूँ...। सो अब मैं इस बोरिंग से सवाल के अपने घिसे-पिटे जवाब में एक लाइन और जोड़ देती हूँ...खाली वक़्त में मैं किस्सागोई करती हूँ...। इतना सुनते ही सामने वाले की उत्सुकता भी एक नया टर्न ले लेती है...। किस्सागोई बोले तो...एक था राजा, एक थी रानी टाइप...? मुझे उनकी बुद्धि पर तरस भी आता है और गुस्सा भी...। इन्सान चाँद पर भी जा पहुँचा और मंगल पर भी पहुँच ही जाएगा किसी दिन...पर ऐसे लोग न तो राजा-रानी से आगे जा पाए न ही उनकी कल्पना में किस्से सुनाती किसी औरत का चित्र उभर पाया है...। उनके लिए तो किस्सागो माने कि गाँव की चौपाल में पगड़ी बाँधे बैठा कोई पाहुन...जो दूर देस की कहानियाँ अपनी पोटली में बाँध कर लाया है और उनके आगे अपना सारा खज़ाना लुटा कर सुबह होते ही प्रेम से परोसा कलेवा खाकर अपनी अनन्त यात्रा पर आगे निकल जाएगा...किसी और गाँव में रात को डेरा जमा एक नई कहानी, एक नए अनुभव के साथ...।

जब भी कभी ऐसी स्थिति आती है, और कमोबेश यह अक्सर ही आती है, तो पहले तो मैं किसी बुड़बक की तरह सामने वाले का मुँह टुकुर-टुकुर ताकती हूँ...फिर जबरिया ऊपर से नीचे तक गम्भीरता का भारी-भरकम लबादा ओढ़ कर उसके इस अनुमान को भी सिरे से ख़ारिज कर देती हूँ...ना जी, राजा-रानी ही जब न रहे तो उनके किस्से-कहानियों का आज के समय में क्या काम...? मैं तो आज के ज़माने की...इसके नए रंग-रूप की कहानियाँ कहती हूँ...।

कहने को तो मैं ये सब बातें कह देती हूँ, फिर खुद ही सोच में पड़ जाती हूँ...। जाने कब और कहाँ पढ़ा था कि दुनिया में सिर्फ़ सात ही कथानक होते हैं और उन्हीं पर घूम-फिर कर...थोड़ा हेर-फेर करके कहानी कह दी जाती है...। अगर ऐसा है तो फिर क्या नया ज़माना और क्या नए ज़माने की कहानियाँ...? पर मैं साहित्य की इन गूढ़ पचड़ों में नहीं पड़ती कभी...। मुझे क्या लेना-देना इन बातों से...मैं कौन सा कोई महान साहित्यकार घोषित की जा रही हूँ...?

ख़ैर, छोड़िए भी इन सब बातों को...। कौन माथापच्ची करे इन सबसे...। मैं तो भैय्या सीधी-सादी किस्सागो हूँ और वही रहूँगी...। अब यहाँ दीगर बात यह है कि सामने वाला मेरी इत्ती सी बात से ही बेतरह प्रभावित टाइप होकर झट से फ़रमाइशी गीतों के कार्यक्रम की तरह मेरे सामने अपनी फ़रमाइश रख देता...हमको भी तो सुनाइए न कोई किस्सा...। लो जी...मानो किस्सा न हुआ, कोई फल या टॉफ़ी हो गई कि झट से झोले में हाथ डाला और खट्ट से मुँह में डाल लिया...। अरे भाई, सोचना पड़ता है...कहानी गुननी-बुननी पड़ती है न...। तब कहीं जाकर कुछ बाहर आता है...। पर सामने वाले को इनसे क्या सरोकार...? और वैसे भी, आज के ज़माने में किसी को किसी भी बात से कोई सरोकार रह ही कहाँ गया है, जो कोई बन्दा किस्सागोई जैसे खाली बैठे-ठाले लोगों वाले काम से कोई सरोकार रखे...। अब तो हर इंसान बस मतलब का सरोकार रखता है न...। आपसे मतलब निकला नहीं कि फिर सारे सरोकारों की धूल झाड़ता हुआ वो आपसे पूछेगा...तू कौन भाई, ख़ामाख़्वाह...?

तो यहाँ बात हो रही थी सामने वाले की फ़रमाइश की...। तो मैं भी ज़माने की ताल से ताल मिला कर चलने वालों में से हूँ। ऐसे लोगों के लिए ज़्यादा नए किस्से-विस्से के चक्कर-वक्कर में नहीं पड़ती मैं...। बस अपने झोले में हाथ डाल कर उन सात कथानकों में से कोई एक निकाल उसके सामने उछाल देती हूँ...। उसको भी क्या? उसे तो बस दुनिया भर की गॉसिप सरीखा आनन्द मिलना चाहिए...आप बोलिए और वो मुँह बाय सुनता रहेगा...। फिर संतुष्ट-असंतुष्ट होकर वहाँ से उठ कर चल देगा...किस्सा खतम, प‍इसा हजम टाइप...।

अभी पिछली बार जो किस्सा सुनाया था, उसे सुनेंगे आप...? वो क्या है न, कभी-कभी जब कोई नया इन्सान नहीं मिलता न मेरे किस्से सुनने को, तो एक अजीब सी बेचैनी टाइप होने लगती है अन्दर से...। लगता है, इतने खाली सी ज़िन्दगी में एक यही तो रस बाकी है...। कहीं ये भी सूख गया तो...? ऐसे में कोई तो चाहिए न जिसे मैं अपनी किस्सागोई के रस में डुबो-डुबो कर निकालूँ...। ऐसे में अगर आप जैसे सहृदय लोग मेरी मदद नहीं करेंगे तो कौन करेगा भला...?

तो किस्सा कुछ यूँ शुरू होता है...एक लड़का था...। वैसे आप चाहें तो ‘था’ की जगह ‘है’ भी कर सकते हैं, पर अगर किस्से को ‘किस्से’ की तरह सुनना है तो ‘था’ ही लगाना पड़ेगा। ‘है’ बोलने से वो किस्सा कम और कोई कोरी, सपाट घटना ज़्यादा लगने लगती है। सो मैं ‘था’ कहने में अधिक सहज रहूँगी...और शायद आप भी...।

हाँ तो एक लड़का था। अब लड़का था तो जाहिर सी बात है उसका परिवार भी होगा। तो था न...इस लड़के का भी परिवार था। आज के ज़माने के बावजूद ‘हम दो, हमारे एक या दो’ टाइप नहीं...पूरे पाँच-पाँच बच्चों वाला परिवार...। इस परिवार में लड़के के माँ-बाप थे और लड़के की तीन छोटी बहनें और एक सबसे छोटा भाई...। कुल मिला कर पाँच हुए न...? अब मुझे एक बात समझ नहीं आई कि लोग आज के इतने उन्नतिशील समाज में रहने के बावजूद लड़के के चक्कर में ही तो लड़कियों पर लड़कियाँ पैदा किए जाते हैं, पर यहाँ तो यह लड़का पहलौठी का ही बच्चा था, फिर एक बहन हो जाने के बाद माता-पिता ने फ़ुलस्टॉप क्यों नहीं लगा दिया? अच्छा खासा एक भाई-बहन वाला परिवार होता...छोटा परिवार, सुखी परिवार...। हाँलाकि छोटा परिवार हमेशा सुखी ही हो, इसकी गारण्टी कोई नहीं ले सकता, पर हमें-आपको इससे क्या...? कहने का चलन है, सो मैने भी कह दिया। हमको तो अपने किस्से में इस लड़के और उसके इस ग़रीबी-ग़ुरबत की मार झेलते परिवार के किस्से को आगे बढ़ाना है न...।

सुविधा के लिए लड़के का एक नाम रख देती हूँ। आपको पसन्द आए तो ठीक, वर्ना अपने हिसाब से कोई भी नाम रख लीजिएगा...क्या फ़र्क पड़ता है...? तो माता-पिता ने इसके जन्म पर बड़ी खुशी के साथ इसका नामकरण किया था-किसना...। साँवला था न, काले होने की हद तक, सो नन्दकिशोर के एक नामों में से ज़्यादा मुफ़ीद नाम किसका होता भला...? तो अपना ये किसना जो था, शुरू से बड़ा होशियार टाइप था। अपने हम‍उम्र अन्य लड़कों के मुकाबले थोड़ा ज़्यादा ही चिन्तनशील और गम्भीर...। अब ये बात और है कि दिन भर रिक्शा चलाने वाले बाप और दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा-बर्तन करने वाली माँ...इन लोगों के लिए उसका यह स्वभाव चिन्ता का विषय था। हाँ, जब वह अपने मोहल्ले-टोले के लड़कों से किसी बात पर पटका-फोड़ी कर आता था, तब उसके पक्ष में लोगों को गालियाँ बकते पिता और हाथ नचा-नचा के सामने वाले के पूरे खानदान को शापित करने वाली माता का करेजा अच्छे से ठण्डा हो जाता था। इन सारे क्रिया काण्डों के बीच बस इतना ध्यान रखा जाता था कि मामला कोर्ट-कचहरी तक न पहुँचने पाए...। उस मोहल्ले में न तो कभी पुलिस आई थी, न आनी चाहिए। सिर्फ़ एकलौती यही वजह थी कि उस मोहल्ले का कोई बाशिन्दा पहले तो कभी चोरी-चमारी के झमेले में पड़ा नहीं...और कभी ऐसा कोई लफ़ड़ा हो भी गया, तो बाकी शहरों या कहिए समूचे देश के चलन के मुताबिक पहले ही कुछ ले-देकर मामला रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाता था। घर के बाहर का मामला घर के बाहर ही रखा जाता था...। अब ठीक-ठीक तो मुझे नहीं मालूम कि इसके पीछे की वजह क्या थी, पर इतना तो तय था कि उस गली में तो छोड़िए, उसके आसपास भी जाने क्यों कभी पुलिस तो क्या, पुलिस का कुत्ता भी नहीं भौंका...।

तो हुआ यूँ कि हर तरह से इतने सुरक्षित मोहल्ले में एक सुबह पुलिस की एक नहीं, दो-तीन जीपें आ धमकी...और वो भी ऐन किसना के घर के दरवाज़े पर...। अभी कुछ लोग सो रहे थे...कुछ कुल्ला-दातुन कर रहे थे। पर जैसे ही ये अनहोनी देखी, लोग चद्दर-तकिया फेंक के दौड़े-भागे किसना के दरवाज़े आ जुटे। पुलिस वाले किसना के बापू को गर्दन से दबोचे बस एक ही सवाल अलग-अलग तरीके से...अलग-अलग विशेषणों के सहयोग से पूछ रहे थे...किसना कहाँ है...? अब परदेस में रह कर, सरकारी मदद पाकर ऊँची पढ़ाई करने वाला किसना इम्तिहान के समय तो अपने कॉलेज के हॉस्टल में ही होगा न साहेब...इत्ती सी बात भी पुलिसवालों को समझ नहीं आती क्या...?

अब पुलिस को क्या और कितना समझ आया, कौन जाने...पर मोहल्ले के लोग इतना बड़े आराम से समझ गए कि किसना ने ज़रूर उस शहर में कोई बड़ी वाली पटका-फोड़ी कर डाली है जो इत्ती सारी पुलिस उस एक डेढ़ पसली के लड़के को पकड़ने के लिए सुबह-सवेरे आ धमकी है...। किसना के बापू को तो पुलिस थोड़ी देर में थाने ले गई, पर उनके जाने के बाद मोहल्ले की सारे औरत-मर्द ज़मीन पर पछाड़ें खा-खाकर गिरती किसना की अम्मा के आसपास जुट गए। अबकी तो तनिको ख़बर तक नहीं हुई कि कोई मसला है, वर्ना हमेशा की तरह ये खाकी वर्दी की हवा तक इस गली में न आ पाती। किसना की तीनों बहनें रधिया, रमिया और रतिया हकबकाई सी सबसे छोटके रामरतन उर्फ़ रमुआ को उसके अफ़ीम के नशे से जगाने की जुगत में लगी थी। बापू और किसना के पीछे अब वही तो इस घर का एकलौता मरद था...। ऐसे बखत में उसको ही तो आगे आकर सब मामला निपटाना चाहिए...। पर वो कुम्भकरण की औलाद को न जागना था, न वो जागा...। हार कर तीनों बहनों ने अपनी सारी तवज़्ज़ो अपनी माता की ओर कर ली।

घर में जब कोई ज़िम्मेदार मर्द न हो अपने घर की औरतों की देखभाल के लिए, तो ऐसे में दुनिया का शायद हरेक मर्द उस घर का स्वयमभू रक्षक बनना अपना परम धर्म और कर्तव्य मान लेता है। सो ऐसा ही उस मोहल्ले के मर्दों ने भी किया। अब वे कोई दुनिया से अनोखे तो ठहरे नहीं न? तो बहुत खींचतान के बाद यह तय पाया गया कि मामला थोड़ा संगीन टाइप लग रहा, वर्ना पुलिस कोई फ़्री नहीं बैठी है कि छोटे-मोटे मसलों को निपटाने अपने दल-बल के साथ आ धमके...। ऐसे में यह उस मोहल्ले के मर्दों के वश के बाहर की बात थी। सो बेहतर यही होगा कि किसना की माँ जिस घर में बरसों से झाड़ू-कटका कर रही, और जिन साहब के कहने पर ही इन दोनो मियाँ-बीवी ने अपना पेट काट कर और अपनी बच्चियों के मुँह का निवाला छीन कर किसना को स्कूल और फ़िर कॉलेज भेजना शुरू किया था, अब वो मदद के लिए उन्हीं के पास जाए...। वो पैसे वाले आदमी हैं, बहुत पढ़े-लिखे भी हैं...और शहर के बड़े-बड़े लोगों के बीच उनका उठना-बैठना तो खुद किसना की माँ अपनी आँखों से देख चुकी है...अब बस वो ही उसके तारनहार हो सकते थे। आखिर किसी तरह पता तो चले कि मामला है क्या...?

तो भैय्या, चार-पाँच तमीज़दार टाइप के मर्द किसना की अम्मा के साथ साहब के घर जा पहुँचे। साहब ने सिगरेट के छल्ले उड़ाते, चाय का सिप भरते सारी बातें सुनी और अपने सम्भव मदद करने का आश्वासन भी दे दिया। सारी बातें हो चुकने के बाद किसना की अम्मा ने साथ आए रहनुमाओं को विदा करके शान्त मन से साहेब के घर में झाड़ू-पोंछा-बर्तन का अपना कर्तव्य भी निर्वहन कर दिया। शाम होते, न होते किसना के बापू तो घर आ गए पर उनसे भी पहले जंगल की आग की तरह आसपास के इलाकों में यह ख़बर आम हो गई कि किसना ने अपने कॉलेज में कोई ज़बरदस्त पटका-फोड़ी कर डाली और अब गिरफ़्तारी से बचने के लिए फ़रार हो गया है...।

किसना तो खैर फ़रार होकर जाने कौन बिल में जा छिपा था, पर पुलिसवालों ने उसके न मिलने की खुन्नस उसके बापू को अधमरा-सा करके निकाली थी। मोहल्ले के मुख़बिरों ने अपने-अपने जाल बिछाए, तब कहीं जाकर कोई उड़ती चिड़िया बस इत्ता बता पाई कि किसना ने अपनी आँखें तो मोटी-मोटी किताबों में घुसा कर...पढ़-पढ़ कर सुजा ली, और जब इम्तिहान के रिज़ल्ट आए तो वो तो पास न हुआ, उल्टा दिन भर कॉलेज में लड़कियों के संग कैन्टीन में हँसी-ठठ्ठा करते हुए वक़्त बिताने वाला...दादा टाइप लड़का अच्छे नम्बरों से पास हो गया। सुनने में ये भी आया कि कॉलेज के आने वाले चुनाव के चलते दोनों में पहले से ही कुछ खींचतान चल रही थी। कहने वालों ने तो यह तक कहा कि चुनाव, पढ़ाई...ये सब तो बस बहाना है, असल बात तो दोनो का एक ही लड़की पर आशिक़ हो जाने का मामला था।

अब असली बात तो राम जाने या कृष्ण, पर कुल मिला कर अब तक की कहानी का लब्बो-लुआब यह है कि जो भी कारण रहा हो, तीन दिन पहले किसी नामालूम-सी जगह पर उस दादा टाइप लड़के को तीन-चार लोगों ने घेर-घार कर कुछ इतना पीटा कि सिर में पन्द्रह टाँके आए तो आए, बन्दा दो दिन को आईसीयू में भी भर्ती हो गया। अब किसना तो ठहरा मामूली मजदूर घर का लड़का...सामने वाली पार्टी अच्छी-खासी दमदार थी। शहर के छुटभैय्ये नेताओं की रोजी-रोटी बहुत हद तक उस लड़के के बाप के दम पर चल रही थी। ऐसे में होश में आते ही बन्दे ने इधर किसना को नामजद किया, उधर दे दनादन इधर की पुलिस ने माई-बाप को सलाम ठोंकते हुए किसना की अनुपस्थिति में उसके बाप को ही ठोंक डाला।

फ़रार किसना का पता लगाने के पुलिस ने हॉस्टल में दबिश देने की कोशिश की, पर कॉलेज भी किसी कम खाते-पीते लोगों का नहीं था, सो पुलिस की एक न चली। कॉलेज प्रशासन ने साफ़ शब्दों में कह दिया, अपने परिसर के अन्दर पुलिस को घुसवा कर वह छात्रों के मन में अपनी सुरक्षा को लेकर सवाल नहीं उठने देंगे...। पुलिस को जो करना हो, कॉलेज परिसर के बाहर ही निपटा ले...।

तो लो जी, अन्धा क्या माँगे? दो आँखें ही न...? आँखें हों तो फिर कहना ही क्या...। दुनिया की सारी रंगीनियाँ तो इन आँखों की बदौलत ही है न...। अरे, आज तो लोग नेत्रदान करने भी लगे हैं, पर पहले तो कितनी ग़लतफ़हमियाँ थी न इसको लेकर...। फिर भी इतने दानी आज भी न हुए हैं लोग कि हर अन्धे को दो-दो आँखें लगा दी जाएँ...। हुंह...क्या हुआ भई...? ओह! अच्छा...! किस्सा आगे सुनना है आपको...? ओफ़्फ़ोऽऽऽ...आप लोग भी मुझे बीच में टोक-टोक के विषय से भटका देते हैं...। हमें-आपको क्या करना इन सब दान-पुण्यों से...आप तो भैय्या, चुप्पेचाप किस्सा सुनिए न...।

तो ख़ैर! वापस अपने किस्से पर आती हूँ मैं...। तो साहब, पुलिस ने भी कॉलेज की बातों में छिपे इशारे को समझा और बिल्कुल खामोशी से जिस गली आई थी, उसी रस्ते वापस भी चली गई...। पीछे छोड़ गई तो सादे वेश में अपने दो-चार खाली बैठे-ठाले टाइप के बन्दे...। लेकिन किसना भी जाने कौन घाट का पानी पीकर उसी में डुबकी मारे बैठा था कि थाने में खाली बैठ सुख की नींद सोने वालों का दिन का चैन गायब हो गया। सो किसना तो क्या मिलना था, उसकी ग़ैरहाज़िरी में पुलिस ने पूरी निश्चिन्तता से हॉस्टल से बाहर आकर पास की मार्केट में घूमने गए किसना के खास दोस्तों को ही धर-दबोचा...। और साहब, दबोचा भी कुछ ऐसे-वैसे नहीं, खालिस मसाला अन्दाज़ में...भरी भीड़ में से उठा कर वैन में ये डाला और वो उड़न-छू...।

चश्मदीदों ने तो बाद में टी.वी में आकर यह तक क़बूला कि दुनिया में अराजक तत्वों का कितना बोलबाला है और कैसे दिन-दहाड़े, भरे बाज़ार के बीच से असामाजिक तत्वों द्वारा उन बच्चों को किस तरह किडनैप किया गया था। संवाददाता ने हवा में उड़ती अपनी घुँघराली लटों को समेटते हुए, कल्ला फाड़-फाड़ कर दिन-दहाड़े अराजक तत्वों की दिलेरी बढ़ने की रिपोर्ट बनाई, शूटिंग देखने जुटे तमाशाबीनों के बीच में दो-तीन मुस्कराते-आह्लादित चेहरों पर अपनी निगाहें जमा कर उनसे सारा ब्योरा लिया...और जनता को सब कुछ देखते हुए जागते रहने की हिदायत भी दे डाली...। ये तो रिपोर्ट प्रसारित हो जाने के बाद पता चला कि उठाने वाले चाहे जैसे भी तत्व रहे हों, कानूनी दृष्टि से अराजक तो बिल्कुल नहीं थे...।

चैनल की तो ख़ैर फ़ज़ीहत कौन करता, इतना टाइम ही किसके पास है आजकल...पर किसना के उन दोस्तों की पुलिस ने अच्छी तरह मेहमाननवाज़ी कर डाली...। अब पुलिसिया अतिथि-सत्कार के विषय में आप मुझसे तो पूछिएगा मत...मैं ठहरी एक औरत-जात...। लाख किस्से-कहानिय़ाँ सुनाऊँ, पर अपनी मर्यादा का ध्यान तो मुझे रखना पड़ता है न...? एनीवे, ज़्यादा डिटेल्स न पूछिए मुझसे, मुख्य बात सुनिए...। जो भी, जैसा भी हाल उन सब का हुआ हो, पर इसके बावजूद किसना के खास दोस्तों ने बस लगातार एक ही बात दोहराई कि घटना के समय वे लोग पिक्चर देखने गए थे, वो लोग इस बात का सबूत भी दे सकते हैं, पर पुलिस ने ऐसे किसी भी सबूत के होने से साफ़ इंकार करते हुए उन सबको उठा कर थाने में बन्द कर दिया। दूसरे दिन जमानत पर छूटने के बाद उन सबने भरे गले से हर मिलने आने वाले पत्रकर और चैनल्स के सामने किसना के जुझारू व्यक्तित्व और अनजाने कृतित्व का पूरे मनोयोग से वर्णन किया...। उनको देखते-सुनते हुए जाने कितनों ने अपनी आँखें पोंछी और कुछ लोगों ने साथ में नाक भी सुड़की...। सुनने में आ रहा कि जल्दी ही एक गरीब-होनहार छात्र के इस पुलिसिया उत्पीड़न के ख़िलाफ़ कॉलेज के जुझारू छात्र लामबन्द होकर एक आन्दोलन छेड़ेंगे...।

अब जैसा कि कहानियों में भी और असल ज़िन्दगी में भी होता आया है, छात्रों ने ऐसा सिर्फ़ कहा ही नहीं, बल्कि किया भी...। जाने किसने रातों-रात इस आन्दोलन में शामिल होने की गुज़ारिश करते हुए पर्चे छपवा भी डाले और गली-मोहल्लों-कूचों में बँटवा भी डाले। देश भर के सारे लोकल-नेशनल चैनलों ने बहुत प्रमुखता से इस आन्दोलन पर अपनी अपनी रिपोर्टें बना डाली...। ब्रेकिंग न्यूज़’ को बार-बार स्क्रीन पर चमकाने के अलावा बाकायदा इस जन-आन्दोलन को लेकर जनता की राय भी माँगी गई...। आखिर दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातन्त्र है भैय्या...कोई मज़ाक थोड़े न...। जनता की राय तो चाहिए कि नहीं...? सो ‘हाँ’ और ‘ना’ दोनो में से एक को चुन कर एस.एम.एस करने के लिए टी.वी स्क्रीन पर फ़्लैश किए जा रहे नम्बर नोट करने के लिए कुछ जागरुक लोगों ने अपने हाथ में सुविधानुसार मोबाइल या काग़ज़-कलम थाम लिया।

हाँलाकि उन पर्चों में अपील करने के साथ-साथ इस बात पर भी पूरा ज़ोर दिया गया था कि यह समस्त आन्दोलन बेहद शान्तिपूर्ण तरीके से किया जाएगा...। पर पता नहीं आम जनता क्यों ऐसे किसी भी दावे पर विश्वास करना ही नहीं चाहती। सो इधर दूसरे दिन से कॉलेज में अनियतकालीन अवधि के लिए कक्षाओं का बहिष्कार किया गया, उधर आसपास के इलाकों में दुकानदारों और व्यापारियों ने अपनी दुकानों का शटर गिरा डाला। छात्रों को इससे क्या फ़र्क पड़ना था, सो उनके द्वारा मोर्चे और जुलूस निकाले गए, नारेबाजी करते हुए पुलिस और भ्रष्ट राजनेताओं के पुतले जलाए गए...और फिर सबकी कवरेज करते हुए हर समाचार-चैनल के एंकर ने चीख-चीख कर बोलने वाले कुछ लोगों को इकठ्ठा करके बाकायदा पूरे दिन उसी बहस को जारी रखा...। जिन छात्रों ने इसमें अपना कोई लेना-देना नहीं रखा, वे बिना छुट्टी लिए ही टिकट कटा कर अपने-अपने घरों को सटक लिए...।

जाने क्या बात थी कि एक नामालूम-सी जगह पर घटी इस घटना के लिए नामजद किए गए एक गुमनाम से लड़के के पक्ष में कुछ ऐसी बयार बही, कि उस दादा टाइप के लड़के के बाप की सारी हनक पानी माँग गई...। रूलिंग पार्टी के ख़िलाफ़ इस आन्दोलन में अचानक विपक्षी पार्टी के कुछ दक्काक नेताओं ने रुचि दिखानी शुरू कर दी...। एक अनाम सी पार्टी के उससे भी ज़्यादा गुमनाम नेता ने छाती ठोंक-ठोंक कर किसना को अगली बार अपनी पार्टी की ओर से एक प्रबल उम्मीदवार मान कर शोर मचाना शुरू कर दिया। जन-सभाएँ आयोजित की गईं। रातों-रात किसना एक नामालूम से लड़के से बहुत ऊपर उठ कर एक ब्राण्ड बन चुका था। अब एक बार फिर किसना के बाप के दरवाज़े कुछ गाड़ियाँ रुकी, पर अबकी वहाँ मौजूद किसी भी इन्सान के अन्दर किसी तरह का संशय या डर नहीं दिखा, बल्कि उसके स्थान पर एक गर्व और उत्सुकता अपने आँचल से सबका मुँह सुहरा रही थी...। आखिर सब कहते न थे, कि इस किसना में कुछ तो है...। ये टी.वी वालों की गाड़ियाँ...ऐसे तामझाम आसानी से देखने को मिलते हैं भला...? किसना के तो माँ-बाप, भाई-बहन सब हकबकाए से थे। उसके बापू ने अपना सूजा मुँह अंगोछे से छिपाना चाहा, पर टी.वी वाले बाबू ने बड़े इज्ज़त और प्यार से उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया...। उसने खुद अपने हाथों से किसना के बापू के लिए खाट बिछाई, थोड़ा घिनाने के बावजूद उसके गन्धाते बदन को अपने हाथों से समेट कर बड़े प्यार से अपने बगल में बिठाया और कायदे से समझाया कि उसको किस सवाल के जवाब में क्या बोलना है...। क्या नहीं बोलना है, इसकी उसे कोई खास चिन्ता नहीं थी...। कौन सा लाइव टेलीकास्ट होना था अभी, वो सब तो एडिटिंग में निपटा लिया जाएगा...।

बापू से फ़ुर्सत पाकर संवाददाता किसना की माँ की ओर घूमा। उसको भी समझाया, शूटिंग हो जाएगी तो पैसा भी मिलेगा...ये भी बोला...। सहमति में गर्दन हिलाती किसना की माँ पहले तो जार-जार रोई, और किसी को नहीं पता कि ये आँसू खुशी के थे या ग़म के...पर जैसे ही कैमरा चालू हुआ, उसकी ज़बान और बदन, दोनो को जैसे लकवा मार गया। हार कर माइक थामे हुए एंकर ने कैमरामैन को निर्देश दिया कि ज़्यादा फ़ोकस किसना के बापू पर होना चाहिए...। हाँ, बीच-बीच में वह जैसे-जैसे इंगित करेगा, कैमरा उसके भाई-बहनों के अलावा उसकी उस टूटी-फूटी अधपकी-सी झोंपड़ी पर भी बड़े इत्मिनान से घूमना चाहिए...। दर्शकों के मन पर उनकी दयनीय हालत का गहरा इम्पैक्ट पड़ना चैनल की सफ़लता के लिए बेहद ज़रूरी था...।

इस सारी गहमागहमी और चैनलों पर मचने वाली चीख-पुकार और बहसों के दरमियां एक दिन बहुत खामोशी के साथ किसना जैसे अन्तर्ध्यान हुआ था, वैसे ही प्रकट भी हो गया। चन्द मिनटों के अन्दर ही पुलिस पर दबाव पड़ा और आनन-फ़ानन में किसना जेल की सलाखों के पीछे था। चैनल वालों को बहस का एक नया मुद्दा मिल गया। जो चैनल सत्तारूढ़ पार्टी की रोटी से अपना घर चला रहे थे, उनके अनुसार किसना देश का नया अराजक-तत्व था...। विपक्षी दल के किसी दिन सत्ता में आने की आशा पाले दूसरे चैनलों ने किसना को आज के युग का नया क्रान्तिकारी घोषित करने में कोई कोर-कसर न रखी थी। समाचार-पत्रों, गली-नुक्कड़ों पर, घर में चाय पीते हुए...सब तरफ़ किसना-किसना का इतना नाम लिया जा रहा था, मानों यह कलयुग नहीं, साक्षात द्वापर युग हो। सब तरफ़ ‘होये प्रकट कृपाला, दीन-दयाला’ वाले ढंग से लोग किसना-किसना करने में जुटे हुए थे। उस समय देश के हर छोटे-बड़े इन्सान की चिन्ता सिर्फ़ एक तरफ़ थी-किसना..,। रोजी-रोटी के मुद्दे कहीं दूर पड़े सिसक रहे थे।

नारे तो बहुत लगे, भाषण भी बहुत दिए गए...पर असल बात क्या थी, अभी भी कुछ पता नहीं था। थाने की तंग कोठरी में बैठा किसना अपने ‘गुरू’ को बहुत शिद्दत से याद कर रहा था। काश! इतनी बड़ी-बड़ी बातें करने वाले...उसके मन में क्रान्ति का अलख जगाने वाले गुरूजी एक बार तो आकर उसका हाल पूछ जाते...। ठीक है वो बाकी के कई सारे लड़कों की तरह देश के हालात पर बढ़-चढ़ कर अपना मत पेश करता था...पर इसका मतलब ये थोड़े न था कि उसका मकसद कोई परिवर्तन लाना था। किसी नक्कारखाने में अकेली तूती क्या कर लेती है भला...? पर जाने कैसे गुरूजी उसमें नई सम्भावनाएँ तलाशने लगे थे। कितने प्यार से उन्होंने उसे एक दिन अपने पास बुलाया था...अपने घर...। उसे आश्चर्य हुआ था...। वह ऐसा मेधावी...ब्रिलियेन्ट टाइप बन्दा भी न था कि मास्साब का ध्यान उसकी ओर इतना जाता कि इतनी भीड़ में उसे ही अकेले बुलाते...वो भी शाम के खाने पर...।

दोस्तों ने उसे छेड़ा भी था...जा बेट्टा...कोई लड़की होगी गुरूजी की...फ़्री में लाइन मार आना...। अब मज़ाक तो और भी किए थे सब ने...आप तो जानो हो आजकल के लड़कों का आपसी मज़ाक...पर मैं बस ढँके-छुपे ही बताती हूँ अपने किस्सों में...। आपको सुनते-गुनते हुए जो कल्पना करनी हो, कर लीजिए...मुझे कौन सा फ़र्क पड़ जाना है...? तो भैय्या, किसना भी मन में जाने कैसी-कैसी कल्पनाएँ पाले गुरूजी के दरवाज़े जा पहुँचा था। किसना ने कभी किसी से खुल कर अपना भूगोल-इतिहास तो न बताया था, पर ताड़ने वालों से कौन बचा है भला...? और फिर कॉलेज के पास तो उसका सारा जुगराफ़िया मौजूद था ही...। गुरूजी ने भी गिलास में वाइन डाल कर उसके हाथ में जबरिया पकड़ाते हुए कहा था, शरमाओ नहीं यहाँ...तुम मेरे ही बच्चे हो...। बाप से कैसी शर्म...और वह भी सारी शर्म-हया-घुटन वाइन में घोल कर पी गया था।

बहुत सारे मिडिल या लोअर मिडिल क्लास के लोगों की तरह उसने भी वाइन पहली बार ही पी थी। अगर बहुत अच्छा नहीं, तो बुरा भी नहीं लगा था उसका स्वाद...। सच बोलूँ तो उसको पसन्द ही आया था...। अब ये सब सुन कर आप ये न सोचने लगिएगा कि मैने वाइन या कोई और दारू-शारू पी है कभी...। राम-राम भजिए...तौबा-तौबा...! मैं तो बस अपने किस्से को आगे बढ़ा रही थी। ख़ैर! मुझे छोड़िए...किस्से पर ध्यान दीजिए...। तो साहब...अन्दर की बात यह है कि गुरूजी ने पहले तो उसे वाइन पिला कर बोतल में उतारा, फिर उस दादा टाइप के लड़के की अराजकता पर प्रकाश डालते हुए किसना के मन में अच्छे से यह बात बैठा दी कि अगर इस कलयुग के कंस का कोई बेड़ा गर्क कर सकता है तो वह सिर्फ़ किसना ही है...। सिर्फ़ वही लड़का क्यों...अपने जैसे बाकियों की ज़िन्दगी का भी अगर उद्धार हो सकता है, तो वो भी किसना जैसे नौजवानों के ही हाथों...। यानि कुल मिला कर जब तक किसना उनके घर से वापस हॉस्टल आया, गुरूजी की वाइन उसकी रगों में बहने लगी थी।

देखिए भई, अब ठीक-ठीक तो मुझे भी नहीं पता कि इसके बाद उस दादा टाइप लड़के की धुलाई करने के पीछे किसना का हाथ था या उसकी ही तरह किसी और उद्धारक का...पर नामजद तो अपना किसना ही हुआ न, सो मान लेते हैं, वही था इन सबके पीछे...। अब सच जो भी हो...आपको क्या करना है...? कौन सा आप ही हरिश्चन्द्र की औलाद बैठे हैं...?

तो आगे फिर किस्सा कुछ यूँ है कि पहले तो जीत का सेहरा पुलिस के सिर बंधा और किसना चौदह दिनों की रिमाण्ड पर सीधा उनके हत्थे चढ़ गया, पर इससे उसके समर्थन में चल रहा आन्दोलन बिल्कुल भी नहीं थमा, बल्कि और भड़क गया। बात गली-कूचों-मोहल्लों के दायरे से निकल कर देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जा पहुँची थी। ‘किसना-किसना’ की जो बयार बही तो किसी आँधी की तरह सरकार की आँखों में जा घुसी...। चुटकर-पुटकर दलों से ऊपर उठ कर मुख्य विपक्षी दलों ने उसे अपनी सरपरस्ती में लेते हुए सरकार का जीना हराम कर दिया।

तो साहब, ऐसे ही एक दिन आखिरकार सरकार को झुकना ही पड़ा। गाजे-बाजे के साथ किसना को रिहा करा के लाते हुए विपक्षी दल के अहम नेताओं ने बाकायदा राष्ट्रीय चैनल पर ‘सत्य की जीत’ की नारेबाजी के साथ अपने फेफड़ों में सारी ताज़ी या प्रदूषित, जैसी हवा मिली, भरते हुए बुलन्द आवाज़ में किसना को अपनी पार्टी से आगामी विधानसभा चुनावों में अपना प्रत्याशी भी घोषित कर दिया। दोस्तों के कंधों पर चढ़े, फूल-मालाओं से लदे-फँदे किसना को भी अपने कल्कि अवतार होने पर पूरा यकीन होने लगा था।

उस दिन के बाद से कई दिन हो गए...। किसी समाचारपत्र, किसी चैनल ने ग़लती से भी किसना का नाम नहीं लिया...। किसना ने उसके बाद क्या किया, इसके भी कोई एक दावेदार नहीं मिलते मुझे...। उसके घर की हालत लगभग वैसी ही है...। बस सुनते हैं कि टी.वी वालों के आने से पहले शायद कोई धर्मात्मा किसना के बापू को एक झोले में कुछ दे गया था। शायद उसी का कमाल हो कि किसना के बापू ने किराये का रिक्शा चलाना छोड़ कर अपना खुद का रिक्शा ले लिया...और उसकी माँ सिर्फ़ साहेब के घर को छोड़ कर अब और कहीं काम नहीं करती...। छोटा भाई एक छोटा-मोटा ठेकेदार हो गया है, अफ़ीम का नशा अब सिर्फ़ रात में करता है और जल्दी ही तीनो बहनों की शादी भी हो ही जाएगी...।

अब आप पूछेंगे कि इस कहानी का अन्त क्या है...? तो भैय्या, जैसे हर चीज़ के दो रूप होते हैं...हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, उसी तरह इस कहानी के भी तो दो अन्त हो सकते हैं न...? मान लीजिए, किसना को इस सब फ़ालतू की मार-कुटाई, भ्रष्टाचार से नफ़रत हो गई हो और अपनी पढ़ाई शान्तिपूर्वक पूरी करके वह अब कहीं मामूली ही सही, पर इज्ज़त की नौकरी करके अपना परिवार का सहारा बन गया हो...।

या ये भी हो सकता है कि वह विपक्षी दल में शामिल होकर राजनीति के दाँव-पेंच सीखता हुआ अगले चुनाव में साम-दाम-दण्ड-भेद को अपनाता हुआ जीतने की जुगत में हो...। क्या मालूम, उस किसना और उसके जैसे हज़ारों किसना अपने जीवन के लिए कब और कैसा अन्त चुन लें...?

पर जो भी हो भैय्या, मैं तो ठहरी एक मामूली गृहस्थन...मैं तो सबका भला ही सोचूँ हूँ...। तो चलिए, कहानी ख़तम और प‍इसा हजम करते हुए अब आपसे भी राम-राम...। बस हमेशा की तरह सबकी मंगलकामना करते हुए मैं तो इतना ही कहूँगी...जैसे उनके दिन बहुरे, वैसे ही...।



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