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प्रियंका की छोटी सी दुनिया में
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कुछ आदतें समय के साथ भी नहीं बदलती...। हाँ ज़िन्दगी के रोलर-कोस्टर में ढुलकते-पुलकते कहीं किसी कोने में ज़रूर जाकर छिप सकती हैं, पर जैसे ही पहला मौका मिला नहीं, कि सिर उठा कर सामने तैनात...। लो जी, फिर से सम्हालो मुझे...फिर से दुलराओ...और ताज़ा कर लो मुझसे जुड़ी अपनी अनगिनत यादों को...। ऐसे ही जाने किन लम्हों में दो साल पहले आज ही के दिन मेरी गीत, गज़लों और कविताओं को एक डायरी में लिख कर रखने की कच्ची उम्र की एक भूली-बिसरी आदत ने इंटरनेट के रास्ते धीरे से सिर उठाया तो ‘कलाम-ए-मोहब्बत’ नाम के एक ब्लॉग ने जन्म लिया...। इस ब्लॉग के साथ जाने कितनी यादें चली आई थी। गर्मी की छुट्टियों की वो दोपहरें, जब अपने मर्फ़ी ट्रांजिस्टर को अपने करीब रख कर बजाते हुए मेरे सामने हमेशा एक कागज़-पेन भी तैयार रहता था। कोई पसन्दीदा गाना आया नहीं कि कागज़ पर तेज़ गति से लिखे गए शब्द टेढ़े-मेढ़े होने के बावजूद अपनी पूरी शिद्दत से दिल तक जा पहुँचते थे। फिर बारी आती थी उस चील-बिलौटा लिखावट को अपनी डायरी में पूरी सजावट के साथ सुलेख में ज्यों-का-त्यों उतार देने की...। यही शगल मेरे जैसी कुछ और सहेलियों का भी हुआ करता था। जब भी मुलाकात होती, एक-दूसरे की डायरी खंगाली जाती...गाने मिलाये जाते थे, जिसके पास जो गाना नहीं, वह दूसरे की डायरी से कॉपी कर लिया करती थी। 

बातों-बातों में यह बात एक दिन जब भैया अभिषेक को पता चली तो झट से उनके अन्दर का ब्लॉगर जाग गया और फट से एक ब्लॉग बना डालने का आइडिया मेरे सामने था। जैसा कि मुझे कहने की ज़रूरत नहीं, पर ‘कलाम-ए-मोहब्बत’ को उसका खूबसूरत रूप देने में, जब-तब उसकी सार-संभार में बिन बोले, बिन माँगे मेरे इस छोटे भाई ने कितना योगदान दिया, यह मैं बिल्कुल भी नहीं बताने वाली...। अब दो साल बाद यह ब्लॉग एक वेबसाइट के रूप में, अपनी नई साजो-सज्जा और नए नाम -महफ़िल- के साथ आपके सामने आया है...। सबसे ज़्यादा खुशी मुझे इस बात की है कि दो साल तक मेरी धमकियों से अप्रभावित रहने के बाद आखिरकार इस नये रूप, गीत-कविताओं-शायरी के इस नये-से सफ़र में मेरे साथ मेरा यह छोटा भाई भी शामिल हो गया है। तो चलिए न आप भी...एक बार ‘महफ़िल’ से रू-ब-रू होने...।






आजकल आए दिन अख़बारों, न्यूज़ चैनल्स पर हम कहीं-न-कहीं किसी आत्महत्या की ख़बर पढ़ते-देखते रहते हैं। कभी सूखे या बाढ़ जैसी किसी प्राकृतिक आपदा के चलते कर्ज़े में डूबा किसान अकेला या अपने पूरे परिवार समेत अपनी इहलीला समाप्त करने को मजबूर होता है, तो कहीं कुछ अलग तरह की पारिवारिक समस्याओं से जूझता कोई इंसान मौत को गले लगा लेता है। बोर्ड के इम्तिहान के बाद रिज़ल्ट आने तक तो कुछ वर्ष पूर्व तक जाने कितनी कच्ची उम्र के बच्चे दुनिया ठीक से देखने से पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह जाते थे। आखिर हार कर CBSE बोर्ड समेत कई राज्यों के बोर्ड ने ग्रेडिंग प्रणाली लागू की ताकि इस तरह की मर्मान्तक घटनाओं पर कुछ हद तक काबू पाया जा सके।

ऊपर की बहुत सारी घटनाओं की वजह तो कहीं-न-कहीं आर्थिक स्थिति पर आकर रुक जाती हैं। जब इंसान को रोटी के ही लाले पड़ जाएँ, तब तो उसका हार मानना कुछ समझ भी आता है (हाँलाकि एक अमूल्य इंसानी ज़िन्दगी को ख़त्म कर देने के लिए यह वजह भी किसी तरह से जायज़ नहीं ठहराई जा सकती); पर जब आर्थिक रूप से ठीक-ठाक या सम्पन्न और बहुत हद तक नामी-गिरामी शख़्सियतें अपनी मर्ज़ी से इस बेशकीमती ज़िन्दगी से पल्ला झाड़ लेते हैं, तो मन सोचने पर मजबूर हो जाता है कि वो ऐसा कौन सा पल होता है जिसमें इंसान यह कायरतापूर्ण, लेकिन कठिन फ़ैसला ले लेता है...?

यह तो मानी हुई बात है कि आत्महत्या का फ़ैसला लेना एक मानसिक स्थिति का परिणाम है, और इस मानसिकता का एकमात्र कारण है-डिप्रेशन यानि कि अवसाद...।

बहुत लोगों का यह मानना है कि आत्महत्या एक क्षणिक भावावेश में उठाया गया कदम है। कुछ मामलों में यह बात सही भी है, पर सभी मामलों में नहीं...। कई बार इस अन्तिम फ़ैसले पर पहुँचने से पहले व्यक्ति बहुत चिन्तन-मनन करता है...। खुद को इस दुनिया से विदा करने के लिए तैयार करता है...। तभी ऐसे कई सारे मामलों में हम पाते हैं कि ऐसा व्यक्ति अपने अन्तिम समय में बेहद बदला हुआ महसूस होता है...। कुछ दिनों पहले तक एकदम चुप सा हो चुका, कटा-कटा रहने वाला वही व्यक्ति अचानक ही आम दिनों से ज़्यादा खुशनुमा, मिलनसार और आत्मीय हो जाता है...। ज़रूरी नहीं कि यह बदलाव सिर्फ़ आत्महत्या की पूर्वसूचना हो, शायद यह उसकी स्थिति में सुधार का भी संकेत हो...। पर जो भी हो, ऐसे व्यक्ति के आसपास जो अपने हों, उन्हें सतर्कता की बेहद ज़रूरत है...। सिर्फ़ बड़े ही नहीं, आज की बदलती जीवनशैली और गला-काट प्रतियोगी युग में बच्चे भी इस डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं, जो उनकी आधी-अधूरी समझ और संघर्ष की कम क्षमता के मद्देनज़र और भी भयानक बात है।

एक आम इंसान जब ऐसा कोई कदम उठाता है तो सारा घटनाक्रम सिर्फ़ उसके आसपास या उसको जानने वाले लोगों तक ही  सीमित रह जाता है, पर जब कोई सेलिब्रिटी की हैसियत रखने वाला ऐसा करता है, तो पूरे देश, समाज और मीडिया के साथ-साथ आम जनजीवन भी उसकी परिस्थितियों के बारे में अपने अपने हिसाब से कयास लगाना शुरू कर देता है, जिसमें से सबसे ज़्यादा अहम रूप से उभर कर सामने आता है-प्रेम सम्बन्ध में मिली असफ़लता...। मुझसे बहुत सारे लोग ऐसे मिले हैं, जिन्होंने डिप्रेशन का दूसरा नाम ही किसी के प्यार में धोखा खाना मान लिया है...। अफ़सोस की बात यह है कि अच्छा-खासा पढ़े लिखे होने के बावजूद वे डिप्रेशन को पीलिया, ब्लडप्रेशर आदि किसी अन्य बीमारी की तरह नहीं देखना चाहते, जिसका इलाज सही दवा और आवश्यक का‍उन्सलिंग और देखभाल से सम्भव है...। उनके लिए डिप्रेशन सिर्फ प्यार में असफल होने पर ही हो सकता है, जबकि ऐसा नहीं है...| डिप्रेशन किसी भी मामूली सी लगने वाली वजह से भी हो सकता है, मसलन एक स्कूल,कॉलेज़ या नौकरी से किसी दूसरे स्कूल, कॉलेज़ या नौकरी में जाना...जगह-परिवर्तन, किसी अपने की लम्बी बीमारी या उसकी मौत (इस अपने की मौत में बेहद प्रिय पालतू जानवर की मौत भी शमिल है...), किसी सपने का पूरा न हो पाना, किसी दोस्त का साथ छूटना, किसी खास परिस्थिति से सामन्जस्य न बिठा पाना, अपनी इच्छाओं का लगातार गला घोंटते जाना...इत्यादि-इत्यादि बहुत लम्बी लिस्ट बनाई जा सकती है, जो अवसाद या डिप्रेशन की मूल वजह हो सकती है...।

डिप्रेशन भी किसी अन्य बीमारी की तरह अपने कई स्तर पर हो सकता है। शुरुआती स्तर का अवसाद सम्हालना खुद उस व्यक्ति के हाथ में हो सकता है, अगर समय रहते उसे पहचान लिया जाए। ऐसे में वह व्यक्ति खुद अपने हिसाब से अपनी जीवन शैली में परिवर्तन लाकर उससे उबर सकता है। पर अगर यही बीमारी अपने अन्तिम ‘एक्यूट स्टेज़’ तक जा पहुँची, तब इसे सम्हालने के लिए सही इलाज के साथ-साथ उस इंसान के किसी अपने का सहयोग बेहद ज़रूरी है। इसी एक्यूट स्टेज़ में पहुँच कर उस व्यक्ति के दिमाग में आत्महत्या के विचार पनपना शुरू हो जाते हैं, जो धीरे-धीरे बहुत गहरे तक अपनी पैठ बना लेते हैं...। समय रहते चेत गए तो ठीक, वरना दिमाग़ में हो रहे विभिन्न रसायनिक असन्तुलन से उपजी यह बीमारी उसे मौत की नींद सुला कर ही दूर होगी।

दुःखद बात यह है कि ऐसे मामलों में उसके आसपास...उसके साथ रहने वाले लोग उसके जाने के बाद ही इस चेतावनी को समझ पाते हैं। उन्हें तब याद आता है कि आम तौर पर बेहद खुशनुमा रहने वाला वो व्यक्ति पिछले कई दिनों से गुमसुम सा...चिड़चिड़ा होकर बात-बात पर रो पड़ने वाला हो गया था। उसकी इस हरकत से इरीटेट होने वाले उसके अपने समय रहते जान ही नहीं पाते कि अपने खोल में सिमट जाने वाला वह व्यक्ति अन्दर से उन अपनों में से किसी भी एक सहारे के लिए किस कदर बेचैनी महसूस कर रहा होता है...। एक तरफ़ आप उससे परेशान होकर उसका साथ छोड़ते हैं, दूसरी तरह वह आपको उस परेशानी से मुक्त करने के लिए हमेशा  को आपका साथ छोड़ के चल देता है। यहाँ समझने वाली बात यह है कि एक्यूट डिप्रेशन से ग्रस्त व्यक्ति खुद बहुत बड़ी दुविधा में जीता है। वह आपका साथ नहीं चाहता, पर आपको साथ छोड़ते देख बर्दाश्त भी नहीं कर पाता। वो नहीं जानता कि अपनी बातों, अपने व्यवहार से वह आपको हर्ट कर रहा, पर आपकी बातों से वह बहुत आसानी से हर्ट हो जाता है। हर छोटी-बडी  बात का अपराधबोध बेवजह वह अपने अन्दर पालता जाता है, बिना यह समझे कि उसमे उसका कोई दोष था भी नहीं...। यक़ीन मानिए, खूनी और मुज़रिम खुद को भले इस दुनिया का बादशाह समझें, एक्यूट डिप्रेशन का मरीज़ एक चींटी के मरने का अपराधी भी खुद को मानता हुआ अपने आप को इस धरती का सबसे बड़ा बोझ समझता है...और पहला मौका मिलते ही वह इस धरती को अपने बोझ से आज़ाद कर देता है।

एक आम धारणा है कि अकेले रहने वाला या निठल्ला रहने वाला व्यक्ति ही अवसादग्रस्त होता है, परन्तु अधिकांश मामलों में सच होने के बावजूद यह एक सार्वभौमिक सत्य नहीं है...। यहाँ हमको ‘अकेले रहने’ और ‘अकेले होने’ का फ़र्क समझना पड़ेगा। हो सकता है हमेशा भीड़ से घिरा रहने वाला...एक भरे-पूरे परिवार में अपनों के बीच रहने वाला बेहद सफ़ल इंसान भी अन्दर से बिल्कुल अकेला हो...और यही अकेला होना बेहद घातक साबित हो सकता है...।

सवाल यह उठता है कि यह अकेलापन कम कैसे हो...? मेरा मानना है कि अगर इस पूरी दुनिया में आपके पास एक भी इंसान ऐसा है जिसके सामने आप अगर खुल के हँस सकते हैं तो समय पड़ने पर ज़ार-ज़ार रो भी सकते हों...उससे बड़ी से बड़ी खुशियाँ बाँटना आप भले भूल जाएँ, पर आपके छोटे-से-छोटे ग़म में अगर आपके आँसू पोंछने और आपको सांत्वना देता हुआ ‘मैं हूँ न’ कहने के लिए वह हमेशा तैयार हो, तब आप सबसे सम्पन्न और भरे-पूरे व्यक्ति हैं...। पर अगर ऐसा नहीं है, तो फिर ज़रुरत पड़ने पर किसी डॉक्टर या काउंसेलर की मदद बिना किसी झिझक के ज़रूर लीजिए |



दुर्भाग्य की बात यह है कि आम जनता को इस बीमारी की सही और सच्ची जानकारी ही नहीं...। बहुत से आत्मगर्वित लोग किसी अवसादग्रस्त व्यक्ति को ‘पागल’ कह कर भी अपना पल्ला झाड़ लेते हैं, और शायद यही वजह है कि कुछ लोग अपनी इस बीमारी को पहचान लेने के बावजूद इसके इलाज के लिए किसी मनोचिकित्सक के पास जाने या किसी अपने से इसका ज़िक्र भी करने में बेहद हिचकते हैं। अन्त क्या होता है, यह कहने की ज़रूरत नहीं...। ऐसे में कितना अच्छा हो यदि दीपिका पादुकोण जैसे ही कुछ और भी खास और आम लोग सामने आकर इस बीमारी के प्रति समाज में जागरुकता फैलाएँ। लोगों को समझाएँ कि यह पागलपन नहीं, बल्कि एक खास तरह का केमिकल लोचा है, जो किसी भी और बीमारी की तरह देखा जाना चाहिए।

आज हमको ज़रूरत है तो सिर्फ़ इतनी कि हम अपने आसपास के किसी अपने को इस बीमारी की गर्त में जाने ही न दें...। जब जितना हो सके, किसी को अपने होने का अहसास दिला सकें...ताकि कोई ज़िन्दगी से कितना भी हैरान-परेशान रहे, पर उससे नाराज़ तो न हो कभी...।
कभी-कभी सोचती हूँ कि इन्सान जब स्वभाव से सौन्दर्य-प्रेमी होता है तो किसी बुरी चीज़ में ऐसा कौन सा आकर्षण होता है कि अक्सर वह खुद-ब-खुद उसकी ओर खिंचा चला जाता है? बात चाहे घर-मोहल्ले-गली में होने वाली गॉसिप की हो या फिर आसपास किसी के साथ घटा कोई हादसा...राष्ट्रीय ख़बर हो या कोई स्थानीय घटना...हमेशा किसी बात का स्याह पक्ष ही क्यों अपनी ओर भीड़ खींचता है...?

हाल की ही बात देख लीजिए न...जब हरियाणा में हो रहे जाट आन्दोलन की ख़बरों से हर न्यूज़ चैनल, हर अख़बार अपनी टीआरपी और प्रसार बढ़ाने की जद्दोज़हद में लगा था, हरियाणा की एक ऐसी भयावह तस्वीर जनता के सामने आ रही थी, किसी को कानो-कान ख़बर न हुई कि उसी हरियाणा के १६-१७ वर्षीय चार बच्चों ने पानी से चलने वाला इंजन तैयार किया है। पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते दाम से निरन्तर जूझ रहे लोगों के लिए क्या एक आशा की किरण दिखाती...राहत भरी ख़बर नहीं थी? मुझे नहीं मालूम कि ब्रेकिंग न्यूज़ के बीच कभी-कभार छन कर सामने आए ऐसे innovative idea के साथ किए गए अविष्कारों को हमारे देश के किस म्यूज़ियम में रख दिया जाता है, पर सोचने की बात यह है कि दिन भर ‘सावधान’ रहने की हिदायत के साथ बार-बार एक ही जैसी भयावह न्यूज़ को ‘रिपीट मोड’ में चलाते किसी भी न्यूज़ चैनल ने इस ख़बर को थोड़ा भी वक़्त देने की ज़रूरत क्यों नहीं समझी...?

चलिए, ऐसी ख़बरों के लोगों पर पड़ते राजनैतिक असर की बात यहाँ नहीं करते...। बात करते हैं इस तरह की खबरों का लोगों के मन पर पड़ने वाले असर की...। बात करते हैं आम जनता के मन में किसी राज्य...किसी तबके...किसी जाति...या किसी देश के प्रति पड़ने वाले असर की...। यानि बात करते हैं छवि की...। विदेशियों की बात तो छोड़िए, जिनके मन में आज भी भारत यानि साँप-संपेरों-भूखे-नंगों का देश...। वो तो ख़ैर पराये हैं, यहाँ तो हम खुद ही अपने आप को भिखमंगे और चोर-उचक्कों से भरे ‘स्लम्स’ के रूप में उनके सामने पेश करने को लालायित रहते हैं...। यक़ीन न आए तो फ़िल्म-फ़ेस्टिवल्स में भेजी जाने वाली अधिकांश फ़िल्में उठा कर देख डालिए...।

फ़िल्मों की बात छोड़ भी दें...विदेशों की बात रहने भी दें तो भी हम अपने बीच भी अपने देश को ‘बर्बाद गुलिस्ताँ’ दिखाने में कोई कसर नहीं रखते...। अपने किसी देशवासी से पूछ कर देख लीजिए...वो किसी ऐसे राज्य या जगह के बारे में आपके सामने ऐसी भयावह तस्वीर पूरे अधिकार भावना से खींच कर रख देगा (बिना वहाँ गए या वहाँ के बारे में जाने...) कि आप तो क्या, आपकी आने वाली सात पुश्तें उस जगह का रुख़ करने में काँप उठेंगी...।

इस मामले में मेरे लिए सबसे आसान उदाहरण बिहार का है...। बे-पढ़े तबके को छोड़ दीजिए, अच्छा-खासा पढ़ा-लिखा...बुद्धिजीवी तबका भी धाराप्रवाह रूप से बिहार और बिहारियों की एक भयंकर तस्वीर आपके सामने पेश कर देगा...। वहाँ के गाँव-देहात की ही नहीं, राजधानी पटना भी आपके नज़रों के सामने एक आदिवासी क़बीले की छवि बन कर नाचेगा...। ज़रा पूछ के देखिए ऐसे जानकारों से, क्या उन्हें पता है...पटना के गाँधी मैदान में बने revolving restaurant के बारे मे, जो अगर थोड़ा समय से बन पाता तो देश का पहला revolving restaurant होता?

उत्तर प्रदेश के बारे में भी अगर इतना नहीं, तो कमोबेश यही हाल है...। यू.पी से बाहर रहने वाले लोग बहुत बार यू.पी का नाम सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ लेंगे। हरियाणा में जाने से डरने वालों को मैं ऐसे कितने ही जाटों से मिलवा सकती हूँ जो इन्सानियत और आत्मीयता की मिठास से लबरेज़ हैं...। मध्य-प्रदेश की पहचान सिर्फ़ चम्बल नहीं और न ही कश्मीर की खूबसूरती किसी फ़िल्म-स्टार की मोहर की मोहताज़ होनी चाहिए...। मेरे कहने का तात्पर्य बस इतना सा है कि अगर हम चाहें तो किसी तालाब में उगे कमल की सुन्दरता...उसकी पवित्रता को नमन कर सकते हैं और अगर चाहें तो उस तालाब की गन्दगी से घिना भी सकते हैं...।  पर मेरा सवाल वही है...क्या ज़रूरी है कि हम सिर्फ़ बुराइयाँ ही देखें...? कभी कोई अच्छाई भी तो ऊपर रखी जा सकती है न...।

इन सबके लिए अगर देखा जाए तो मीडिया सबसे बड़े दोषी के रूप में उभर कर सामने आएगा। न केवल प्रिंट या ब्रॉडकास्ट मीडिया, बल्कि सोशल मीडिया भी बहुत हद तक इसके लिए ज़िम्मेदार है...। जिस समय संचार के विभिन्न माध्यम साम्प्रदायिकता, जातिवाद, वर्गभेद आदि तमाम मुद्दों पर चीख-चीख कर बहस करते हुए दिलों में नफ़रत के बीज बो रहे थे, कितनों को पता चला कि इन सबके बीच भी एक मुस्लिम मित्र और उसके परिवार ने एक हिन्दू मित्र से किये गए सिर्फ़ एक वायदे को निभाने के लिए उसके दो मासूम-अनाथ बच्चों को कानूनी रूप से अपनाया...? न केवल अपनाया, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि अपने अपने जन्मजात नाम के साथ-साथ वे अपने धर्म और रस्मों-रिवाज़ों को निभाने के लिए ताउम्र आज़ाद रहें...। उनकी इस मंशा की पाक़ीज़गी पर सन्देह करने वालों के लिए यहाँ ये भी बताती चलूँ कि उन दोनो बच्चों के माता-पिता की छोड़ी हुई समस्त सम्पत्ति पर उस दोस्त ने पहले ही एक ऐसा कानूनी पहरा बैठा दिया, जिससे बड़े होने पर सिर्फ़ वे दोनो बच्चे ही अपने माँ-बाप की दौलत का उपयोग अपनी इच्छानुसार कर सकें...। यही नहीं, बल्कि दोस्ती और इन्सानियत के उनके इस जज़्बे को अपने सही मुक़ाम तक पहुँचाने वाले उनके वकील ने इस काम के लिए एक पैसा भी लेने से इंकार कर दिया...। जाहिर सी बात है, मीडिया को इससे अपनी टीआरपी बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं दिखी, सो कहीं इसका कोई ज़िक्र किया भी नहीं गया...।

माना अपने देश में बहुत सी कमियाँ हैं, पर कमी किस देश में नहीं...? कुछ उँगली पर गिने जाने लायक देश हों शायद, पर जहाँ तक मेरी जानकारी है चोर-उचक्के, जेबकतरे, राहजन, खूनी और भिखारी तो अमेरिका और इंग्लैण्ड में भी हैं...। नस्लवाद और रंगभेद की ख़बरें तो जाने दुनिया के किस-किस कोने से हम सुनते रहते हैं...। पर आश्चर्य, हममें से कोई भी विदेश जाने के नाम से कभी नहीं डरते...। भ्रष्टाचार, स्कैण्डल और राजनीतिक से तो विकसित देश भी अछूते नहीं, फिर भी हम उन्हें बुरा नहीं कहते...। आखिर क्यों...?

जब से दुनिया बनी...जब से इंसान अपने अस्तित्व में आया तब से अन्धेरे और उजाले की जंग जारी है...। तय तो बस हमको करना होगा कि हमें किसके पक्ष में खड़ा होना है...। नफ़रत और भय की काली अन्धेरी रात के आगे प्यार और इंसानियत की रोशनी भी कहीं न कहीं मौजूद होती ही है, बस ज़रूरत अपनी आँखों को उसका अभ्यस्त बनाने की है...।



                                                            (चित्र गूगल के सौजन्य से )
‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए...’
बरसों पहले जब निदा फ़ाज़ली साहब ने ये लाइन लिखी होगी, निश्चय ही उनके मन में ख़ुदा...भगवान या गॉड की कल्पना ही साकार हुई होगी...। एक बच्चे में भगवान बसता है, ये कितना सही है...इसे वही इंसान पूरी शिद्दत से महसूस कर सकता है जिसने एक नन्हें फ़रिश्ते को किसी भी रिश्ते में अपने करीब जाना हो...।

अपना बचपन तो, चाहे वो अच्छा रहा हो या बुरा, सभी जीते हैं...पर बड़े होने के बाद एक बार हमें ऐसा खूबसूरत मौका फिर तभी मिलता है जब हमको एक नए रिश्ते के रूप में अपना बचपन वापस मिलता है...। फिर चाहे वह हमारी अपनी औलाद हो...हमारा भानजा/भानजी...भतीजा/ भतीजी...या फिर नाती-पोता का नाम लेकर हम तक वापस आ जाए...। बच्चा और बचपन...दोनो ही हर नाम, हर रिश्ते में बेहद खुशनुमा अहसास से लबरेज़ होते हैं...।

मैने अपने अब तक के जीवन में अपना बचपन कई-कई बार जीने का खूबसूरत मौका हासिल किया है...। पहली बार तब, जब मैं बचपन बस पार ही कर रही थी और मेरे छोटे भाई के रूप में चिन्टू को मैंने मात्र ढाई घण्टे की उम्र में अपनी बाँहों में लिया था। खुद के उस रूप की तो बिल्कुल भी याद नहीं थी (कितना स्वभाविक है न...?), पर अपने बाद उतना छोटा बच्चा मैंने पहली बार देखा था। लगातार तीन घण्टों तक मैने उसे अपने से अलग नहीं किया था। बार-बार उसके नन्हें-नन्हें कोमल हाथ-पैर-चेहरे को मैं कितने एहतियात से सहलाते हुए आह्लादित हो रही थी, बिल्कुल साफ़-साफ़ आज भी याद है...। अब ये बात और है कि आज दाढ़ी-मूँछ वाले छः फुटे चिन्टू के आगे खुद मैं ही छोटी सी लगने लगी हूँ...।

दूसरा मौका मुझे अपने बचपन के करीब जाने का तब मिला था, जब चुनमुन मेरी गोद में आया। उसकी बेइन्तिहा बदमाशियों के कारण हँसते-चीखते-झल्लाते-खेलते-मुस्कराते दिन कैसे बीतते थे, याद ही नहीं...। उसको कहानियाँ सुनाते कितनी बालकथाएँ मैने रच दी...कितने भूले-बिसरे खेल फिर से खेले...व्याकरण और गणित के नियम-सिद्धान्तों को पढ़ाती-सिखाती मैं कितनी बार पुरानी यादों में जाकर एक बार फिर बचपन जी आई...उसकी तो कोई गिनती ही नहीं अब...।

तीसरा मौका मुझे मिला आज से दो साल पहले, जब 21 फ़रवरी 2014 की सुबह...लगभग तड़के ही अभि का खुशी से किलकता फोन आया...बधाई हो दीदू...तुम मौसी बन गई...। बस अभी...दस मिनट पहले...। उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि मौसी बन कर भी उतनी ही खुशी मिलती है, जितनी माँ बन कर...। तभी तो शायद मौसी को ‘मासी’ भी कहते हैं न...। अयाँश से मिलना भले न होता हो, पर समय-समय पर उसकी प्यारी-प्यारी तस्वीरों...मोना यानि उसकी मम्मी के बनाए उसकी शैतानियों के वीडियोज़ और फोन पर उसकी चर्चा से मुझे कभी लगा ही नहीं कि वो बिल्कुल मेरे सामने मौजूद नहीं रहता। दूर रहने के बावजूद उसकी बहुत सारी मासूम हरकतों की मानो मैं भी एक चश्मदीद गवाह बन जाती हूँ...।

अयाँश आज दो साल का हो रहा। सोचा तो था कि उसके लिए कुछ बेहद खास लिखूँगी, पर तबियत ने ऐन वक़्त पर साथ न दिया...। यूँ ही कुछ हाइकु उस नन्हें फ़रिश्ते के लिए...मौसी की ओर से एक प्यार भरी भेंट के रूप में...






खिलखिलाता
मामा को घोड़ा बना
राजकुँवर ।









(मामा अभिषेक के साथ...)















ज़िद करता
चाहिए चंदा बॉल
माँ है हैरान ।





(माँ मोना की गोद में चहकता हुआ...)









मौसी का प्यारा
बलैयाँ ले हँसती
शैतानियों पे ।



(मौसियों निमिषा और सोना के साथ )





पिता ने जीया
अपना बचपन
काँधे पे बिठा ।









                                             
                                              (पिता अंशुमन के कांधो पर सवारी )





याद है आता
दूर देस में बसा
अपना चाँद ।






(नाना-नानी की गोद में...जब ननिहाल से चला जाता है तो दोनों को अपना नातू बेइंतिहा याद आता है...)

और अब कुछ हाइकु सिर्फ अयांश के लिए...







जब भी हँसे
रोशनी-सी बिखरे
मन-आँगन ।














करे रोशन
पूरा घर-आँगन
सूर्य के जैसे ।






जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक़ मेरे इस बदमाश भांजे को...यूँ ही बदमाशियाँ करते रहो...यूँ ही हँसते-खिलखिलाते रहो...हमेशा...साल-दर-साल...|
ढेर सारा प्यार नन्हें शैतान...<3 

                                       
                                        अपने पहले जन्मदिन पर अयांश...किसी प्यारे गुड्डे सा...

कितनी बार ऐसा होता है न कि कोई मीठी-सुरीली सी याद चुपके से आपके दिल के किसी कोने में बैठी गुनगुनाती रहे, और आपको उसका पता भी न चले...। वक़्त की आपाधापी में...रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की भागदौड़ में फ़ुर्सत किसे होती है कि वो पल भर को थमे...सुस्ताये और अपने अन्दर कहीं गहरे दब चुके ऐसे संगीत का आनन्द ले...?

पर वक़्त पर कब किसकी पकड़ होती है भला...? तभी तो, आप करते रहें अपनी व्यस्तता का गुणगान...। वक़्त एक दिन चुपके से आता है और एक स्वर-लहरी आपके कानों में छेड़ कर हवा हो जाता है...। आप बस मंत्रमुग्ध रह जाते है...। आप होते हैं...आपकी तन्हाई होती है...और होती है गुनगुनाती यादें...।

ऐसी ही एक मीठी याद मेरे मन को भी बस यूँ ही सहला गई...बरसों पुरानी...जब एक दिन अचानक ज़माने बाद ‘ईलू-ईलू’ गाना सुन लिया। इस बार साल का अन्दाज़ा है मुझे...। लेकिन हमेशा की तरह, बस अन्दाज़ा, थोड़ा ऊपर-नीचे सा...। वैसे भी यादें कब किस दस्तावेज़ की मोहताज़ हुई हैं...?

तो साल था शायद 1991-92 का...। मैं किशोरवस्था में प्रवेश कर चुकी थी और मेरा लाडला छोटा भाई चिन्टू तीन-साढ़े तीन साल का था तब...। दुनिया के लिए मेरा ममेरा भाई...पर मेरे मन ने कभी भी भाई-बहन के रिश्तों का उप-विभाजन स्वीकार नहीं किया...। इस लिए वह मेरे लिए हमेशा मेरा भाई रहा...| भाई सिर्फ़ बड़ा या छोटा हो सकता है...चचेरा-ममेरा-फुफेरा नहीं...। न ही मेरे लिए यह ज़रूरी रहा कि रिश्ते सिर्फ़ खून से जुड़े हों...। मन सच्चा तो हर रिश्ता सच्चा...वरना सब झूठ...।

तो बात हो रही थी मेरी उस समय की एक याद की...। ‘सौदागर’ फ़िल्म रिलीज़ हो चुकी थी, पर जैसा कि सभी को याद होगा, तब सिनेमा-हॉल जाकर फ़िल्में देखना इतना आसान काम नहीं होता था...। एड़ी-चोटी का ज़ोर लगता था, मान-मनौव्वल की जाती थी, अच्छे बच्चे की तरह कई दिन तक माँ-बाप की हर बात माननी होती थी, तब कहीं जाकर हमको एक मूवी दिखाई जाती थी...। ऐसे में सबसे सहज-सुलभ तरीका था, मम्मी को मक्खन लगाओ...कोई फ़िल्म क्यों अच्छी है, यह समझाओ...। सहेलियों की मम्मियों का उदाहरण दो कि फ़लाँ-फ़लाँ सहेली की मम्मी अर्थात आँटी ये फ़िल्म उसको दिखा के लाई हैं...फ़िल्म बहुत अच्छी है...वगैरह-वगैरह...। उसके बाद धीरे से यह भी जोड़ दो...हॉल में बहुत पैसे लग जाएँगे...आपको भी मेहनत पड़ेगी सब काम निपटा के निकलने में...। इससे अच्छा शनिवार का दिन है, घर में वी.सी. आर पर ही यह फ़िल्म देख कर सन्तोष कर लेंगे...।

अब यह बात और है कि ये सारे तरीके मेरी सहेलियाँ आजमाया करती थी...। मेरी मम्मी इतनी आसानी से कन्विन्स न होती थी। ऐसे में अक्सर मैं यह चर्चा नानी के घर में चलाती...। माँ ना-नुकुर करती रह जाती, मेरे मामा-मौसी (जिनमें से ज़्यादातर रोज़ की मेहनत से थक कर फ़िल्में देखना बेहद पसन्द करते थे...) तुरन्त तैयार हो जाते...। अगला चरण होता था माँ को इस बात के लिए मनाना कि वे मुझे ऐसे में नानी के यहाँ छोड़ दें...। खुद रुकना चाहें तो ठीक, वर्ना मुझे साथ न ले जाएँ...। खासा मुश्किल होता था यह भी...पर मामला फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी पर सैटिल होता था...। माने, अगर माँ मान गई तो मैं खुश...नहीं मानी तो भी...मैं ही दुःखी...।

तो जब उस बार ‘सौदागर’ वी.सी.आर पर देखे जाने के लिए आई, मैं उस दिन तो नहीं रुक पाई...पर जाने किस काम से माँ को दूसरे दिन ही नानी के यहाँ फिर से जाना पड़ा...। शायद छोटी मौसी को कोई ज़रूरी खरीददारी करनी थी और हर बार की तरह माँ और मौसी चिन्टू की ही तरह मुझे भी नानी के यहाँ छोड़ कर बाज़ार भाग गई...। इस बार उन लोगों की हमेशा वाली दलील बिना मुँह फुलाए मैने सहर्ष स्वीकार कर ली...तुम कहाँ थकती फिरोगी...। घर पर आराम से खाओ-पीओ और चिन्टू के साथ खेलो...।

वैसे तो चिन्टू और मेरा एक-दूसरे के साथ खेलना मुझे बेहद प्रिय था, पर बाज़ार न जाने का मलाल हमेशा मेरे मन में रहता था। ऐसे में चिन्टू महाशय भी मेरे साथ ही मुँह लटका कर कुछ देर मेरी गोद में बैठ कर मुझे ‘प्यारी’ करते थे, फिर सब कुछ भूलभाल कर हम दोनो अपनी दुनिया में मस्त हो जाते थे। उस दिन मेरे मन में अभी भी दोपहर तक रखी मूवी देखने के लालच में ऐसा कोई मलाल पैदा ही नहीं होने दिया...। माँ-मौसी के मुँह फेरते ही मैने मूवी चला ली...। कुछ देर तो चिन्टू बाबू बहुत शराफ़त से मेरा साथ देते रहे, पर जल्दी ही ऊब कर अपनी बदमाशी में जुट गए...जिसमें से नम्बर एक थी...आँगन में रखी बाल्टी का पानी अपने ऊपर डाल कर पहने हुए ही कपड़े को फिर से धुल डालना...। वो नहीं तो फिर किसी भी तौलिया से कमरे में पोंछा लगा कर फिर उसे साबुन से रगड़-रगड़ कर साफ़-सफ़्फ़ाक करने की कोशिश में रिन की पूरी बट्टी का खून कर डालना...।

ऐसे आमतौर पर तो मेरे रहते उनको ऐसा कोई अवसर जल्दी मिलता नहीं था, पर उस दिन मैं उनको सम्हालने के मूड में नहीं थी और वो महाशय मेरे साथ टिक कर मूवी देखने के ख़्याल मात्र से बेज़ार...। ऐसे में उसको बार-बार पास बुलाने के बावजूद जब जनाब इग्नोर मारते रहे, तो खीझ कर मैने कह दिया...न आओ मेरी गोदी में...हम इसको गोद ले लेंगे...(इसको बोले तो विवेक मुश्रान...सौदागर का हीरो...जो जाने चिन्टू को किस एंगिल से छोटा बच्चा दिख रहा था...राम जाने...)

यह सुन कर पहले तो चिन्टू ने मुझे हतोत्साहित करने की भरपूर कोशिश की...ये तो इत्ता मोटा है...तुम गोदी लोगी तो गिर जाओगी...। तुम इसकी दिद्दा थोड़े न हो, जो ये तुम्हारी गोदी आएगा...वगैरह-वगैरह...। मुझे चिन्टू का यह नया रूप देख कर थोड़ा मज़ा भी आने लगा था...पर फिर उसको उत्तेजित होता देख मैने ही हथियार डाल दिए...। हम तो चिन्टू की दिद्दा हैं...उसी को गोदी लेंगे...। मेरा इतना कहने भर की देर थी कि सब कुछ भूल कर चिन्टू झट मेरी गोदी में...। उस दिन तो किसी तरह मैने सौदागर देख ली, पर आश्चर्यजनक रूप से चिन्टू जाने कितने दिनों तक विवेक मुश्रान के लिए अपनी नापसन्दगी जाहिर कर ही देता था...। उसकी किसी भी मूवी का गाना बजते देख कर वह मुँह फेर कर सो जाता था...। पर समय के साथ-साथ उसकी याद में से भी यह किस्सा कहीं गुम गया |

यह किस्सा याद आया तो चलते-चलते एक छोटा-सा किस्सा और...।

एक दिन किसी बात पर नाराज़ होकर चिन्टू ने कुछ हिक़ारत के भाव से हमसे कहा...खुद को बहुत सुन्दर समझती हो क्या...। बन्दरिया लगती हो...। हमने भी बेहद शान्त भाव से उत्तर दिया...अच्छा ! पर सब तो कहते हैं मेरी शक़्ल तुमसे मिलती है...फिर...?
चिन्टू ने बेहद गम्भीरता से इस बात का चिन्तन-मनन किया...एक नतीज़े पर पहुँचे...बेहद आत्मीयता से मेरी गोद में आकर बैठ कर मेरा चेहरा गौर से देखा, और बोले," नहींऽऽऽ...वैसे लगती तो बहुत सुन्दर हो...।"



                    (किसी नई शरारत के बारे में बेहद शरीफ़ाना अंदाज़ में सोचते हुए चिंटू महाशय...)


ख़्वाब तहा के रख देती हूँ
रात के पास 
कतरनों में बँटा दिन 
तुरपाई करते बीतता है 
लम्हों की; 
सर्द रातों में 
सारे ख़्वाब ओढ़ के 
अधखुली आँखों संग सोती हूँ 
टीस उठती है 
शायद कोई टूटा ख़्वाब 
फिर ऊँगली में चुभ गया हो...।

-प्रियंका गुप्ता

कौन कहता है
शब्द बेजान होते हैं ?
दफ़न हों सीने में
तो
घुटती हैं साँसें
बाहर निकल भी अक्सर
वार करते है
और
मार देते हैं
किसी न किसी को
या फिर
जब घुटते रहते हैं भीतर ही
खुद मर जाते हैं
अपनी इच्छाओं/ भावनाओं समेत
उनकी मौत पर कोई नहीं रोता
सिवाय दिल के;
तो चलो, कागज़ पर उकेरें
कुछ आड़ी-तिरछी सी लकीरें
नाम दें उन्हें शब्दों का
उड़ेल दें उनमें थोड़ी प्राण वायु
ताकि फिर कभी
जब वो मरें
तो सनद रहे
कभी वो भी थे ज़िंदा...।

(चित्र सौजन्य-प्रांजल अग्रवाल #Sillyphtographer )